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एक आलेख के जवाब में

एक आलेख के जवाब में

अभिव्यक्ति की आज़ादी अच्छी बात है

जो कि

ज़बान कहे, कलम लिखे, तूलिका अलख जगाये

भ्रष्ट राजतंत्र के खिलाफ

सामाजिक कुरुतियों के विरुद्ध

भूखे, प्यासे, दलित और कुचलों के हक में 

हिमायत के लिए.

मेरे आदरणीय दोस्त    

हम उस संस्कर्ति के पाले हैं जिसमें

बाप-माँ का आदर होता है

कोई तुम्हारे परिजनों को गाली दे

या वेश्या कहे आपकी पत्नी को

बताओ केसा लगेगा

कहो बायाँ गाल आगे करोगे.

परन्तु हम ठहरे

गोरी सभ्यता के पुश्तेनी नक्काल

जिसमे नग्नता फेशन है

बेहयाई प्रेम की भाषा

शराब के प्यालों पर

सम्भोगजनित संतानों को   

बहुधा पता ही नहीं होता

बाप कोन है?

ऐसे संस्कारों की पोषक सोच हेतु     

केसा सम्मान

देवी-देवता-अवतारों-पैगम्बरों के लिए.

नेतिक मूल्यों के विक्रेता जानते हैं

बिकने के लिए प्रचार ज़रूरी है

प्रचार की कुंजी है विवाद

पूज्यनीयों के अश्लील चित्रण द्वारा

पल में

प्रगतिशीलता के नाम पर  

कूडादान गुलदस्ते बन जाते हैं. 

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर जान कुर्बान

परन्तु विकृत और अश्लील ज़हनियत का  

कलम–कूची–छेनी के सहारे

संवेदनाओं के साथ बलात्कार

असहनीय है.

मेरी आँखों में पूरब का सूरज उगता है

पश्चिम का काला चश्मा उतार कर

आप भी उजले सच को देखो. 

रफत आलम

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नया साल-पहला दिन

साँस दर साँस पढ़ा जाता

कम हुआ

जीवन पुस्तक में एक नीरस अध्याय

गया २०११ का साल

गुजरी आधी रात को

शहर की पांचतारा महफिलों में

चर्बी चढे पेटों के हो-हल्ले ने

उमंगों भरे जाम ज़रूर खनकाए

निशचिंता के खुमार में

दोपहर बाद तक सोयी पड़ी रही हैं

लक्ज़री कारें.

अक्सर तो झोपडियाँ थकी हारी

सर्दी की लिहाफ में काँपती हुई

आधे पेट भूख लिए सो गयी थी

सवेरे से ही टायर जला कर

अधनंगों के खाली हाथ

ठण्ड के इलाज में लगे हैं

या फिर दो रोटी की जुगाड में

बीड़ीयों का धुंआ आवारागर्द है कहीं.

कुछ भी तो नया नहीं आया

यानी अध्याय २०१२ के पहले पन्ने पर

वही कशमकशों भरा दिन बिखरा मिला

भीड़ की कहानी दोहराई गयी जिसमें

सफलता का सूरज पकड़ने ले लिए

हमेशा से भागते हुए कदम

अँधेरा होने तक

कुछ एक आशा के दिए भी

मुश्किल ही अपने दरवाज़े तक

ला पाते हैं शायद.

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नाज़ुक सपने की मोत…-रफत

एक सपना मिला था मुझे

घनी पलकों के शामियानों तले

हीराकनि सी चमकती आँखे

होंठ गुलाब-पंखड़ीयों जेसे

सलोने चेहरे पर मुस्कान सजाये

कुछ पल की चमक फिर अथाह अँधकार

दूज के चाँद का सपना मिला था मुझे

रात की काली सलीब पर ठुका हुआ

नन्हे हाथ-पावों में चुभ गयी कीलें

मैं बदहवासी में निकाल कर

अपने सीने में रोपने लगा था

ताकि अँधेरे से छीन लासकूँ उसे

पर नज़रों में भरने से पहले ही

दूज के चाँद बुझ गया

मुझको कब रहा था ध्यान

बदनसीबी से शापित लोगों को

सपने भी देखने का अधिकार नहीं

अब सज़ा के रूप में बाकी उम्र

अनगिनत सुइयों की चुभन का दर्द लिए

मुझे जागते रहना होगा.

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छले गये ह्रदय की खुद्दारी

बहुत से लोग

जिंदगी की राह में

पलके बिछाए रहने वाले

वाणी, व्यहवार

या वचन से

दे जाते हैं

ऐसे अपूर्णीय घाव

जिनका सालता दर्द

आखरी सांस तक

आदमी के साथ जाता है

अक्सर अनकहा.

होंठों पर बलात

आ ठहरती है खामोशी

आँखों को मुस्कानों के

निर्दोष निमंत्रण से

डर लगने लगता है

विश्वास का बीज ही

मर गया होता है.

अपने आप में

सिमटने का दर्द

वही जानता है

जो भोगता है.

जिसे समझते है

सब अहंकार

वास्तव में छले गये

ह्रदय की खुद्दारी भी

हो सकती है.

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गोद के पले घाव

हम तम में पले हैं साहब

उजियारे के तले हैं साहब

आपको मिली हैं तालियाँ

हमने हाथ मले हैं साहब

किसका गिला किया जाए

घाव गोदके पले हैं साहब

बाकी सब हैं बड़े दागदार

आपही बस भले हैं साहब

सर बच गया क्या कम है

घर ही तो जले हैं साहब

ये महल सडन ही तो देंगे

नीवं में से गले हैं साहब

सर छिपाने निकलने वाले

कटा आये गले हैं साहब

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बूँद में है समंदर

बादलों ने आकाश पर उठ कर देखा

बूंदों में सिमटता हुआ समंदर देखा

सब को मंज़रों की थी तलाश मगर

किस आँख ने मंज़र के भीतर देखा

सपनो की मोत देख चुकी आँखों ने

तंग आकर आखरी बार ज़हर देखा

यूँ भी रूठता है क्या किसी से कोई

रूठने वाले तूने कभी सोच कर देखा

शक्ले बहुत थीं वही चेहरा नहीं था

रास्ते को हमने खूब पलट कर देखा

चोराहे पर जा खोया मंजिल का पता

जिंदगी ने बस ठहर गया सफर देखा

भरोसे में बहुत लुटा होगा वो आलम

फूल भी जिसने मान कर पत्थर देखा

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जन्मों का अधूरा सफर

 

आँखों से दिल के बीच

कदम भर का भी

फासला नहीं था

जब एक मुसाफिर

इसी राह पर चल कर

धडकनों में आ ठहरा था.

फूलों के रुत लेआया था

आँखों में

आंसू का मोसम बन कर

वह दिल से गुज़र गया

विछोह के लंबे रास्ते पर

जिसका पैमाना

दिन-वर्षों के पास कब है

दूरी इतनी है जहां से

तारे छोटे नजर आते हैं.

किसीसे  सूनी आँखें

और छलनी दिल लिए

क्या पता ये सफर

जन्मों में भी तय होगा कि नहीं.

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अब घर जाऊं क्या ..

कश्मकशे-जिंदगी से गुजर जाऊं क्या

दिल में आता है अब मर जाऊं क्या

रात थी साथ वो भी उनीदीं हो चली

भोर के तारे बता अब घर जाऊं क्या

मेरा नसीब तेरी नाव न दुबो दे कहीं

सोचता हूँ तूफ़ान में उतर जाऊं क्या

फिर आँख में लहराया है एक सपना

फिर किसी अँधेरे में उतर जाऊं क्या

थोड़ा लहू भर लूं चेहरे के आंसूओं में

दर्पन की जिद है तो सँवर जाऊं क्या

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हम ही आत्मघाती

गोर से देखो तो देखने के लिए

गंदमेले मन्ज़रों के सिवा

कुछ बचा ही नहीं है.

युद्ध-ध्वंस,अत्याचार-गारतगर्दी

बेदर्दी से काटे गए

दया की भीख मांगते हाथ

संगीनों से छलनी बदन

लहू की नदियों में बहते हुए

अत्याचार के तेजाबी समुद्र में

विलीन हो रहे हैं.

अपने पैशाचिक कर्मों से

दुनिया को नरक बनाने में लगा

स्वय को स्वतंत्र जताने वाला आदमी

हजार जंजीरों में जकडा हुआ है.

धर्म-जाति, गरीबी-अमीरी, ऊँच-नीच के

बंधनों से मानव आज़ाद है कब.

बेबसों की आह, पुकार और विलाप से

न धरती डोलती है

न आकाश में कम्पन होता है.

इंसानी बलात्कार से पीड़ित प्राक्रती

कट  गए जंगलों तले दबी

दम तोड़ने लगी है

हरियाली की चीत्कारें

शहरीकरण के कंक्रीटी बहरेपन में

कब की अनसुनी हो चुकी

सभी जलचर-थलचर-नभचर मिट चले

निराश्रित.

यह ज़रूर है समय के लेखे में

अदर्शय कलम जेसे अब लिख चली है

उजाड़ी गयी धरती कभी स्वर्गरूप थी

इस पर मानव नाम का

एक स्वयभक्षी रहा करता था.

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बेआस न होना कभी

लोग कहते हैं

ज्योतिहीन आँखें अँधेरी होती हैं.

उन्हें नहीं मालूम

इन्द्रधनुषी रंगों के सुंदरतम चित्र

बंद पलकों के पीछे ही उभरते हैं.

चमन के फलों सबसे रसीला स्वाद

आकाश का असल नीलापन

कतरे हुए पंखों की उड़ान

रोज लाख बार अनुभव कर सकती है.

बेपावं वालों के सफर का अहसास

धरती के मंज़र छोडो

जब चाहे तारे तोड़ ला सकता है.

कुछ इन्द्रीय सुविधा से वंचित लोगो!

तुमसे कहीं अधिक निराश हैं

धूप और चांदनी के उजाले.

इसलिए अब कभी न सोचना

खाली होती हैं

भाग्य की छली गयी रेखाएं.

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