जन्मों का अधूरा सफर

 

आँखों से दिल के बीच

कदम भर का भी

फासला नहीं था

जब एक मुसाफिर

इसी राह पर चल कर

धडकनों में आ ठहरा था.

फूलों के रुत लेआया था

आँखों में

आंसू का मोसम बन कर

वह दिल से गुज़र गया

विछोह के लंबे रास्ते पर

जिसका पैमाना

दिन-वर्षों के पास कब है

दूरी इतनी है जहां से

तारे छोटे नजर आते हैं.

किसीसे  सूनी आँखें

और छलनी दिल लिए

क्या पता ये सफर

जन्मों में भी तय होगा कि नहीं.

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अब घर जाऊं क्या ..

कश्मकशे-जिंदगी से गुजर जाऊं क्या

दिल में आता है अब मर जाऊं क्या

रात थी साथ वो भी उनीदीं हो चली

भोर के तारे बता अब घर जाऊं क्या

मेरा नसीब तेरी नाव न दुबो दे कहीं

सोचता हूँ तूफ़ान में उतर जाऊं क्या

फिर आँख में लहराया है एक सपना

फिर किसी अँधेरे में उतर जाऊं क्या

थोड़ा लहू भर लूं चेहरे के आंसूओं में

दर्पन की जिद है तो सँवर जाऊं क्या

हम ही आत्मघाती

गोर से देखो तो देखने के लिए

गंदमेले मन्ज़रों के सिवा

कुछ बचा ही नहीं है.

युद्ध-ध्वंस,अत्याचार-गारतगर्दी

बेदर्दी से काटे गए

दया की भीख मांगते हाथ

संगीनों से छलनी बदन

लहू की नदियों में बहते हुए

अत्याचार के तेजाबी समुद्र में

विलीन हो रहे हैं.

अपने पैशाचिक कर्मों से

दुनिया को नरक बनाने में लगा

स्वय को स्वतंत्र जताने वाला आदमी

हजार जंजीरों में जकडा हुआ है.

धर्म-जाति, गरीबी-अमीरी, ऊँच-नीच के

बंधनों से मानव आज़ाद है कब.

बेबसों की आह, पुकार और विलाप से

न धरती डोलती है

न आकाश में कम्पन होता है.

इंसानी बलात्कार से पीड़ित प्राक्रती

कट  गए जंगलों तले दबी

दम तोड़ने लगी है

हरियाली की चीत्कारें

शहरीकरण के कंक्रीटी बहरेपन में

कब की अनसुनी हो चुकी

सभी जलचर-थलचर-नभचर मिट चले

निराश्रित.

यह ज़रूर है समय के लेखे में

अदर्शय कलम जेसे अब लिख चली है

उजाड़ी गयी धरती कभी स्वर्गरूप थी

इस पर मानव नाम का

एक स्वयभक्षी रहा करता था.

बेआस न होना कभी

लोग कहते हैं

ज्योतिहीन आँखें अँधेरी होती हैं.

उन्हें नहीं मालूम

इन्द्रधनुषी रंगों के सुंदरतम चित्र

बंद पलकों के पीछे ही उभरते हैं.

चमन के फलों सबसे रसीला स्वाद

आकाश का असल नीलापन

कतरे हुए पंखों की उड़ान

रोज लाख बार अनुभव कर सकती है.

बेपावं वालों के सफर का अहसास

धरती के मंज़र छोडो

जब चाहे तारे तोड़ ला सकता है.

कुछ इन्द्रीय सुविधा से वंचित लोगो!

तुमसे कहीं अधिक निराश हैं

धूप और चांदनी के उजाले.

इसलिए अब कभी न सोचना

खाली होती हैं

भाग्य की छली गयी रेखाएं.

क्या हासिल हुआ जिन्दगी से

आँसुओं से चाक गरेबान सिए जायेंगे

उस पर अज़ाब ये है के जिए जायेंगे

और क्या हासिल हुआ है जिंदगी से

गठरी है पापों की साथ लिए जायेगे

देखें कोन हमको दादे सितम देता है

ज़ुल्म कुछ खुद पर भी किए जायेगे

आंसू शराब खूनेदिल सब चुकता हुए

अब जिंदगी है तो ज़हर पिए जायेगे

कुछ भी तो नहीं सांस के सिवा पास

जिंदगी क्या हम यूँ ही जिए जायेगें

तुझको शर्मसार न होने देंगें जिंदगी

इलज़ाम सब अपने सर लिए जायेगें

कल को कोन याद रखता है आलम

कल हम सब लोग भुला दिए जायेगें

चाक–फटे, अज़ाब-पापफल, दादे सितम-अत्याचार की प्रशंसा

 

 

 

 

 

संबंधों की मोत

कोई नयी बात नहीं हुई

आँगन के बीच दीवार खिंच गयी

भाइयों के रास्ते अलग हुए.

मंजिलें तलाशने के प्रयास में

अपनी आँखे संबंधों  की डगर भूलीं

विश्वास बगल में छुरियां टटोलते मिले.

घर के कुँए में वहम हुआ जहर का

मरीचिकाओं से प्यास के सोदे सबने किये.

आदमी अपने साये से भी आशंकित है

इन दिनों.

जिंदगी के अनगिनत तनावों ने

संबंधों की मासूमियत के साथ

अंतरात्माएं भी छीन ली हैं जिस्मो से.

हर शरीर भोतिकता के दलदल में

बेकफ़न छटपटाती हुई ज़िदा लाश हैं.

इसलिए विरासत की हत्या के

गुनहगार भ्राता! ना तुम हो ना मैं.

मेरे सिवा

अँधेरे रास्तों का हक मार कर ले आये

उसूलों वाले बंदे चांदी का सफर ले आये

हमें फिक्र के केसे हो शराब का जुगाड

कोई सुकरात है तो जाके ज़हर ले आये

उनको सुननी ही नहीं थी कहानी मेरी

सिवा मेरे,  बातों में दुनिया भर ले आये

हमसे सहन नहीं हुई जरा सी धूप भी

लोग मुट्ठी में उगता सूरज घर ले आये

सर बचाने के लिए घबरा कर उठ बैठा

ख्वाब भी जाने कहाँ से पत्थर ले आये

ज़रूरी नहीं कोई काव्य उसे कहे आलम

शब्द इकटठे करके तुम मगर ले आये