नाज़ुक सपने की मोत…-रफत

एक सपना मिला था मुझे

घनी पलकों के शामियानों तले

हीराकनि सी चमकती आँखे

होंठ गुलाब-पंखड़ीयों जेसे

सलोने चेहरे पर मुस्कान सजाये

कुछ पल की चमक फिर अथाह अँधकार

दूज के चाँद का सपना मिला था मुझे

रात की काली सलीब पर ठुका हुआ

नन्हे हाथ-पावों में चुभ गयी कीलें

मैं बदहवासी में निकाल कर

अपने सीने में रोपने लगा था

ताकि अँधेरे से छीन लासकूँ उसे

पर नज़रों में भरने से पहले ही

दूज के चाँद बुझ गया

मुझको कब रहा था ध्यान

बदनसीबी से शापित लोगों को

सपने भी देखने का अधिकार नहीं

अब सज़ा के रूप में बाकी उम्र

अनगिनत सुइयों की चुभन का दर्द लिए

मुझे जागते रहना होगा.

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छले गये ह्रदय की खुद्दारी

बहुत से लोग

जिंदगी की राह में

पलके बिछाए रहने वाले

वाणी, व्यहवार

या वचन से

दे जाते हैं

ऐसे अपूर्णीय घाव

जिनका सालता दर्द

आखरी सांस तक

आदमी के साथ जाता है

अक्सर अनकहा.

होंठों पर बलात

आ ठहरती है खामोशी

आँखों को मुस्कानों के

निर्दोष निमंत्रण से

डर लगने लगता है

विश्वास का बीज ही

मर गया होता है.

अपने आप में

सिमटने का दर्द

वही जानता है

जो भोगता है.

जिसे समझते है

सब अहंकार

वास्तव में छले गये

ह्रदय की खुद्दारी भी

हो सकती है.

गोद के पले घाव

हम तम में पले हैं साहब

उजियारे के तले हैं साहब

आपको मिली हैं तालियाँ

हमने हाथ मले हैं साहब

किसका गिला किया जाए

घाव गोदके पले हैं साहब

बाकी सब हैं बड़े दागदार

आपही बस भले हैं साहब

सर बच गया क्या कम है

घर ही तो जले हैं साहब

ये महल सडन ही तो देंगे

नीवं में से गले हैं साहब

सर छिपाने निकलने वाले

कटा आये गले हैं साहब

बूँद में है समंदर

बादलों ने आकाश पर उठ कर देखा

बूंदों में सिमटता हुआ समंदर देखा

सब को मंज़रों की थी तलाश मगर

किस आँख ने मंज़र के भीतर देखा

सपनो की मोत देख चुकी आँखों ने

तंग आकर आखरी बार ज़हर देखा

यूँ भी रूठता है क्या किसी से कोई

रूठने वाले तूने कभी सोच कर देखा

शक्ले बहुत थीं वही चेहरा नहीं था

रास्ते को हमने खूब पलट कर देखा

चोराहे पर जा खोया मंजिल का पता

जिंदगी ने बस ठहर गया सफर देखा

भरोसे में बहुत लुटा होगा वो आलम

फूल भी जिसने मान कर पत्थर देखा