सादगी खा गया शहर

मेरे शहर तेरे कांक्रीटी कब्रिस्तान में

दफन हुए मेरी मासूमियत के सब सबूत

वो सुथरा गावं, चोपाल, चोपड, पासे

ढप, चंग, बांसुरी, अलगोजे.

नीम की छाव में

बुजुर्गों के हुक्कों की गुडगुड

बच्चों के खेल कहानिया किस्से .

आज की भागदोड

अफरातफरी में जिन्हें

कोंन सुने, कोंन समझे.

मगर मैं अभी ज़िंदा हूँ

अपने सुन्हेरे अतीत का अंतिम रखवालो

में से एक

जिसके पास गुज़रे हुए कल का थोड़ा हिसाब है

वही मेरे आज की पूँजी है

मेरा ज़िंदा धन.

बड़ा है यादो का खजाना जिसमें

कुओ, पनघटों पर गूंजते गीतों के मोती

सावन के झूलों की रस्सीयों में

बहक जाते हैं.

लहरियों की ओट से निकले चाँद

खेतों की पगडंडियों गुजर कर

पन्ने जेसे गेहूं पोधों में

जल बूंदों की हीरक वर्षा करते

लचक जाते हैं.

सारे दिन मेंहनत के बाद

पसीने की खुशबु में नहाये

थके थकाए लोट कर भोले चाँद

झोपडियों में नशीली चांदनी का

जब उजाला करते हैं

दीपक आप ही माध्यम होजाते है

हीरों के काँधे लग कर रांझे सो जाते है.

वो गहरा नीला आकाश

तारों भरी साफ़ रातें

निर्मल कोमल हवा

अब कहाँ है गंदमेले शहर तेरे पास.

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तुम अगर समझ सको

मेरी खामोशी ने जो कुछ कहा

तेरी धड़कने जानती हैं

दिल जो दर्पण है

सूखी आँखों की भाषा का

पढ़ लेता है अश्रु भीगे उजाले और

तारों से उतरते शबनमी खतों को

अपनी बेबसी का इज़हार

सबके सामने रोकर किया जाए

ज़रूरी तो नहीं .

खोट है अपनी बंदगी में

मंदिर मस्जिद सूने आश्रमों पर भक्तों की भीड़ लगी है

बन्दों को खुदा पर कम बाबाओं पर ज़्यादा है भरोसा

किस्मत के लिखे से मिलेगा एक सूद भी कम न बेश

जनता को फिर भी ताबीज गंडों पर ज़्यादा है भरोसा

इबादत रोजों में या जुमे का दिन है तय

बंदे जेसे खुदा के ऊपर अहसान करते हैं

मंदिर क्या जाइयेगा सडक से ढोकते चलें

मुश्किलें सब दूर आप भगवान करते हैं

शहर के अक्ल वाले फ़कीर साहब

बन गए सब के सब बड़े पीर साहब

अंधविश्वासी अंधभक्तों का शुक्रिया

लुच्चे रातो रात हुए अमीर साहब

काला है के सफेद पैसा लगाइए

मंदिर बनाइये मस्जिद सजाइए

भक्ति तो भूखे नंगों का काम है

आप तो साहब मस्ती मनाइए

रूघे गले और टूटे हुए दिल के साज़ पर

कोन सा नगमा उभर सकता

सिवा आह के.

आह भी होंठो तक आने से पहले

आँखों की नमी चूम कर

दर्द का सयलाब सुखा देती है.

निगाह होती तो है हजार सावन समेटे

मगर आंसू भरा अफसाना

खामोशी के अंधे कुए में गूंगा पड़ा है.

एसे में कहाँ से कोई सिसकी उभरे

किस सदा की गूंज पलट के आए.

 

असल गुनाहगार हैं आँखे

इंसानी जुर्म की

असली गुनाहगार हैं आँखे.

देखने में ही छिपी है

पाने की लालसा.

देखा तो चाहा

चाहा तो सराहा

सराहा तो पाने के लिए

मानव की चाहत

जाने कब से साम दाम दंड भेद का

सहारा लेती रही है.

विवेक ने सदा ही साथ छोड़ा

जब बुद्धि नज़र की गुलाम हुई है

इतिहास की पुस्तक है गवाह

आदमी ने सभी अपराध

आँखों के बहकावे में किये हैं .

डूबता सूरज टूटती सांस का पता भी

शाम खुशनुमा भी शाम गमज़दा भी

खुशबू का मोसम दुबारा लोटा तो था

बिछड़ने के बाद कोई तुझसे मिला भी

फसलों की हद में कहाँ बंधा है इश्क

बसा है रूह में जो आँख से गया भी

यही तो राज़ है भरने छलकने के बीच

बेखुदी बिन पिए भी होश मयकदा भी

जोतिशी ने जिसे मेरा नसीब कहा था

वो ढलती रात का तारा डूब गया भी

बेकद्र जीवन कतरों सा
अस्तित्व के समंदर में
हिल-मिल जाता है
बेतीर बेठिकाना
लहरों का अंदाज़ किसने जाना.

सीप के मुंह तक पहुँचने वाले खुशनसीब
सुराहीदार गले के हार या
मुकुटों की रोनक बन सकते हैं.
जो भी हो खजानो पर हमेशा
सांपों का पहरा रहता है.

वह लालच नहीं है
भूखे पेट की मजबूरी
बेबस मछलियों को जालों में फंसा देती है
दर्द भरी मोत की सजा देती है.

समंदर को इससे क्या वह
न लंगर न नाव न माझी
मिलनातुर प्यासी नदी
किसी का सगा नहीं.
किनारों तक सिर्फ झाग पहुंचाता है
अपनी गहराई किसे दिखाता है.

उस गहराई की तलाश के लिए
बादलों की राह है खुली
बेकद्र जीवन जीने वालो
तुम्हे बरसात के रास्ते
किसी प्यासी नदी में उतरना होगा.