आसान रास्ता

दुनिया जेब में लिए
ऊँची कुर्सी पर बेठा
थुलथुले बदन वाला मोटा
सोने का चम्मच मूह में लिए
पैदा हुआ है.
फुटपाथ पर जन्मा अभागा
भीख या भूख के सहारे
पल रहा है.
बेछत-बेदर मेंहनतकश्
हजार खून पसीना करके भी
कुदाल-फावड़ों की पकड़ से
हाथ की लकीरों पर बने छाले
मिटा नहीं पाता.
फिर भी ठुकराए गए पत्थरों में कोई
अट्टालिकाओं के शीशे तोड़कर
सोने की तिजोरी पर जा बैठता हैं.
वह शायद समझ गया था
सफलता का आसान रास्ता
जुर्म की गली से होकर गुजरता है.

अखबार की एक कतरन से..

मेला ढोने के बाद
मेरी झोले में फेंकी गयी
बासी रोटियां
उसी अन्न की थी
जिससे गयी रात
तुम्हारी शुभ्धा शांत हुई थी.
मेरी बाल्टी से
सबकी प्यास बुझाते कूए के पानी का
रंग भी नहीं बदला.
बदले तो बस
तुम्हारे भाल के तेवर
जिसके पसीने से सीसा पिघल कर
मेरे कानों में भरने के लिए
दोडने लगा.
सदियाँ गवाह हैं
कुछ नहीं बदला
सियारी ज़बानें लाख झूठी दिलासायें दें
दलित मुफलिस शोषित के लिए
महलो के दिलो में
सदियों से नफरत वही है
जो कि थी
अन्यथा क्यों घोड़ी से उतार कर
मारा जाता
सर्वहारे का बेक़सूर दुल्हा बेटा.

बातें

बोले गए शब्दों का वज़न
सुनने वालो के कान जानते हैं
वह गाली हो गीत हो
या प्यार भरी रेशमी सरगोशी.
ज़बान से कहे गए का प्रतिफल
रोज़मर्रा की जिंदगी में
तुम आसानी से देख सकते हो.
यह ज़न्नाटेदार थप्पड
नाचते क़दमों की थिरकन
या मस्ती भरा चुम्बन
कुछ भी हो सकता है.

किसी भी रिश्ते में
शब्द तोल कर बोलना .
बेख्याली में कही गयी बात
कब फूल से शूल बन जाय
पता ही नही चलता.
पत्थरों से सर ही होते हैं घायल
ज़बान
दिल के कोमल तार काट सकती है.
सर के ज़ख्म तो
पट्टी बंधे रहने तक
याद रहते हैं
दिल के घाव आदमी के साथ
अक्सर कब्र तक जाते हैं.

Aside

वो अप…

वो अपनी जगह सही थे कुछ बोले नहीं

हमने भी अपने दिल के राज़ खोले नहीं

कटी पतंगों की डोर में उलझे हुए पड़े हैं

वो पंछी जिन्होंने परों के वज़न तोले नहीं

विष कसोटी पर भरोसों की होनी है परख

अभीसे केसे कहें आस्तीन में सपोले नहीं

सितमगार तेरी ज़ात से शिकावा बहुत था    

ये और बात लबसिले लोग कुछ बोले नहीं

कालिख की कोटरीयों से बेदाग़ आ निकले

वो पाकदामन जिन्होंने काजल टटोले नहीं  

हमें ज़बान कटने का डर था ये बात सही

आप ही कुछ कहते आप क्यों बोले नहीं

भूखे आँगनों की हवाएं चर रहे हैं आलम 

खूंटा तुडा कर जो बेल आवारा डोले नहीं 

आखरी दाव

पल,दिन,महीनों,वर्षों को सारी उम्र

तोड़ मोड कर बीते कल के कलेंडरों की तरह

वक्त की कब्र में फ़ेंक देने के बाद

जिंदगी की कीमत याद आती है

ढलते सूरज से डरने लगता है आदमी

उम्र के बोझ से झुकता हुआ शरींर

अब रातों का काजल ओस से नहीं धोता

बदन की थकन से पस्त आरजुओं के लिए

न हुस्न दिलफरेब रहता है

न इश्क में गर्मी बचती है

महफिलो से उकताया हुआ अहसास

नींद की गोली की चादर तले सोने के बाद

उजाले की पहली किरणों के साथ

नश्वरता के अबूझ जंगल में कांपता हुआ

पाप-पुन्य, स्वर्ग–नर्क, मोत-मोक्ष जाल में उलझा हुआ

मंदिर मस्जिद गिरजा गुरद्वारों शरण में

अस्तित्व का बोझ लिए जा पड़ता है

हारता हुआ जुआरी आखरी दाव के लिए

जेब में बचीखुची रकम टटोलता हो जेसे.