बेकसूर दरख्तों का मर्सिहा

गुज़रना था राहे जिंदगी से तो मुसाफिर गुजर गए
ये अलग बात है किस तरह से जिए केसे मर गए

क्या हुआ जो सो गए फुटपाथी कुचल कर मर गए
तेज रफ़्तार कारों के काफले अपनी मंजिल पर गए

शहर की मीनारों को खबरदार किया करते थे कभी
वो मासूम कबूतर ज़हरीला दाना चुग कर मर गए

वो शहर की सियाह हवाओं का मुंह धोया करते थे
इतने से कसूर पर अनगिनत दरख्तों के सर गए

महल भी बढे महलों की ऊँचाइयाँ तो और भी बढ़ी
छप्पर जो कुछ थे जब्र की आँधियों में बिखर गए

सोने की चमक में नक़्शे से मिट गए गावं के गावं
खेत सब के सब प्लाटों में कटने के लिए शहर गए

मांगने से पहले उसके दर पर कभी सर झुकाया था
फेले हाथो सोचो तो क्यों कर दुआओं के असर गए

शातिर चालों ने तय किया प्यादों का वजीर बनना
परदे के पीछे शाह बिसात पर खेल अपना कर गए

कल तक ईमानदारी की बड़ी बातें करते थे आलम
मस्जिद के चंदे के हिसाब से अब क्यों मुकर गए

क़ुतुब मीनार के दर्शक

अपने लहू में भिगोते हैं
कागज़ तेरा मूह धोते है
क्रान्ति गीत जन्मता है
मजबूर शब्द जब रोते है
…….
वाकया जो है अँधेरे के दिल से पूछ
सूरज ने कब कहा रौशनी मुझ से है
गयी जान तो धडकन भी बेहवा हुई
साँस को वहम था जिंदगी मुझ से है
वाकया-प्रसंग
…….
जुगनुओं से रूठने के बाद रौशनी के सपने
बुझ गए आसदीपों की कतारों को देखते हैं
माटी के घरों से कहो बारिशों में बह जाएँ
यहाँ लोग सिर्फ क़ुतुब मीनारों को देखते हैं
…………

निगाह हो अगर परख सकने वाली
आबादी के बीच भी हैं वीराने बहुत
अकेले बहुत हुए जब महफिलों में
याद आये यारो गुज़रे ज़माने बहुत
……….
इतनी ना पी बहक जायगा
भर मत यार छलक जायगा
हवा के झोंके के साथ न उड़
गुबार माटी में पटक जायगा
…..

मुखोटो के बीच में घिरा हुआ है आदमी आज
खुद अपने आप से डरा हुआ है आदमी आज
चेहरे सब के सब बनावटी मिले जो भी मिले
नकली मोतियों में पिरा हुआ है आदमी आज

………

इन्तेज़ार के आंसू

दो बरस हुए बड़ा

जल्द आने को कह कर गया था

छोटा भी हवाई जहाज़ में बेठ कर

कुछ रोज हुए चला गया

वो साल बीते आने की कह गया है.

मुझे मालूम है बेटो तुम

प्रवासी परिंदे नहीं जो

अपनी ज़रुरतो के चलते

लोट आते है ठण्ड की रूत में.

तुम्हरे सपने कल तक

बर्फ ढके पर्बतो से कही आगे

सफलता के गीत की मदहोशी में डूबे 

परी सी गोरी मेम के जादू में

केद हो जाने हैं.

यूँ ही होते हैं कीमती हारों में नगीने गुम

यूँ ही फासले संबंधों को खा जाते हैं.

यूँ ही मेरी आंखों में

इन्तेज़ार के आंसू सजे रहने देना

तुम्हारे पाँव मेरे जूते से बड़े हो गए हैं  

तुम्हे सडक पार करने के लिए अब

ऊँगली की ज़रूरत नहीं.Image

बड़े हो गए बच्चे

बच्चे अब ऊँगली पकड़ कर

नहीं चलते

जब आप पसीने में नहाए हुए

खांसते Image रहते हो अकेले.

वे आधी रात के भी बाद तक

किसी कमर में हाथ ड़ाल कर

नाचते रहते है

बड़े हो गये हैं बच्चे. 

खाली हाथो के सफर में

कई बार सोचता हूँ लोगों को

सोना,जवाहिर,महल और हेसियत

आखिर इतने प्यारे क्यों हैं.

जिसके हासिल के लिए

चाटुकार ,भडवा ,बहरूपिया, हरामखोर

जाने क्या क्या बन जाता है आदमी.

वरना तो ईमान की रोज़ी से

जीवनयापन के लिए दो वक्त की रोटी बहुत है.

सफलता सी ज़ालिम कोई मरीचिका नहीं

मज़िलों के सुराग

प्यास के सिवा देते क्या हैं.

निरंतर सफलता की तलाश में

भागते मुसाफिर आखिर गिर पड़ते है

रास्ते में.

कोई लाख सात पीढ़ियों के लिए जतन करे

शवयात्राओं को जाते देख कर

यही आता है ख्याल 

खाली हाथों के सफर में है जिंदगी. Image

रोटी के सफर में

रोटी की तलाश के रास्ते में
भीख के लिए फेले हाथ
कुदाल चलाते और
तिजोरी बने हाथ के बीच
केवल रेखाओं का अंतर है.
कर्म का महत्व समझाने वाले
बहुधा सोने का चम्मच
मुहं में लिए पैदा हुए हैं
या चालबाजी से
किसी को धकेल कर
गिरा कर
सफलता के रास्ते में
आगे निकले हैं.
खून पसीने ने
सफलता के उजास की तलाश में
आँधियों से युद्ध के दोरान
अपनी तमाम ताकत,
सारा हुनर हारने के बाद
अभीलाषाओं के झिलमिल दीपक
भाग्य के अन्धकार को सोंपे हैं.
चाटुकारों,भडवो,बहरूपियों, हरामखोरो के
बेईमान युग तुझे क्या मालूम
मेहनत ने भाग्य दो-दस के बनाए है
बेलगाम शोषण ने
मारा करोड़ों को है.