वे दिन – ये दिन

एक दोर था जब
वह भेजता था पथप्रदर्शक
अवतार पैगम्बर
हम उन्हें हर सूरत सताते थे.
फिर भी
सूली साथ लिए चलने वाले
अपने पाँवो में चुभो कर
हमारी राह से कांटे हटा गए हैं.
एक दोर है अब
गुंडे मवाली लफंगे चोर उचक्के
शेतान के बंदे मसीहा बने है.
खून पसीने को सोने में जमा कर
तिजोरियां भर रहे हैं .
त्रस्त है सर्वहारा पस्त है शोषित
किन पापों की सज़ा स्वरूप
समस्त मानवता हुई शापित.
रहबर बने रहजनों के पंजों में
हमें अकेला छोड़ कर वह
चुपचाप देख रहा है
पत्थर हुआ आकाश.

प्यास दे गया कोई

बिखर गए एक मकान के मलबे पे खडा छोड़ गया

मेरे खून का रिश्ता ही मुझे खून में डूबा छोड़ गया

माना ये बदनपरस्ती सराब के सिवा कुछ भी नहीं

वो भी जिस्म ही तो था जो मुझे प्यासा छोड़ गया

इश्क की राह में लुट के अब हवस के रास्ते पर हूँ

बेचेहरा बदनों के बीच मुझे कोई अपना छोड़ गया

जान बन कर वो अब भी रगों में समाया हुआ है

जाने वाला मेरी धडकनों में अपना पता छोड़ गया

न किसी का इन्तेज़ार है न कोई आरजू रही बाकी

जिंदगी के नाम पर वो मुझमे एक खला छोड़ गया

जो राह चली थी तेरे घर से चोराहों में उलझ खोयी  

आवारा आहटों के हवाले सफर प्यार का छोड़ गया

मयकदे में मुझसे प्यास लिपट कर रोती है आलम

कोई था हर प्याले पर अपना नाम लिखा छोड़ गया  

सराब-मरीचिका,खला-रिक्तता,

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राग मल्हार का समां

महफिलो में शोर को

साज़ सुर संगीत के नाम पर

आइटम सांग  बना कर

अधनंगे पैशाचिक बदन

नपुंसक वासनाओं में कुंठाएं भर रहे हैं.  

इस रौशनी के भूतहा जंगल के पार

रात की श्यामल जुल्फों से खेलता  

खूबसूरत तलिस्मी अंधेरा

खामोशी से तानसेन को सुन रहा है

यानी साम ध्वनी ज़िदा है अभी बाकी

चमन में न सही

वीराने में है सही

राग मल्हार का समां है अभी बाकी. 

गीली सड़कों पर पेचवर्क

ट्रेफिक लाइटों के बीच खो गये
बेनिशान मंजिलों के कारवांनों को
ज़ेबरा क्रोसिंग में उलझी
निगाहें खोजती हैं.
भीड़ के कोलाहल से दूर
रातजगों की खामोशी,
टूट गए तारों से
सूख गए फूलों से
बह गए आसुओं से
न लोटने वाली आहटों का
पता पूछती हैं.
यूँ ही गीली होकर टूटी सड़कों का
पेच वर्क हो जाता है.
दुआओं के कमीशन खोर ठेकेदार का दफ्तर
घड़ियाली आंसुओं और
सूनी आंखों में जम गए दर्द का हिसाब
लिखा करता है
मिटटी के खिलोनों के रंग
यूँ ही सूरज की धूप खा जाती है.
वेसे भी गुज़र गया वक्त
सिर्फ अँधेरे का हिसाब रखता है
जिसके पार
अस्तित्वहीनता के सिवा कुछ नहीं .

आंदोलन का संक्षिप्त सच

हर इन्कलाब की नीव सदा भीड़ की बलि पर रखी गयी है.भीड़ जिसे आज नए संदर्भों में आम आदमी भी कहा जा रहा है, के अहसास की चिंगारी को अपने उकसाऊ भाषणों द्वारा आंदोलन की आग में परिवर्तित करने वाले कलाबाज़ को नेता कहा जा सकता है.ये नेता हमेशा दूसरों के काँधे सवार होकर अपनीं मंजिल तक पहुंचे है जो शक्ति=सोना=सत्ता कुछ भी कही जा सकती है.वक्त की किताब गवाह है किसी भी इन्कलाब ने आम आदमी के संवेदनाजनित बल को अपने फायदे के हथियार के सिवा कुछ भी नहीं समझा.साफ़ नीयत की ज़मीन लिए चले रहनुमा ऊँचाई पर खड़े होते ही धरती के खुदा बनते देखे गए हैं.कुछ एक सच्चे मसीहा भी गुज़रे जिनका स्वागत समय ने सूली,ज़हर और गोली से किया है. इसीलिये कमज़ोर,ताकतवर या शाषित और शासकों के बीच वही खाई आज भी विधमान है जो कि जंगल राज में शेर और खरगोश के बीच होती है.कोई शेर की खाल में भेडीया कितना ही आम आदमी के लिए ईमान की टोपियाँ लेकर आये शोषित का सदा शोषण होता आया है और यह शोषण हमेशा होता रहेगा.

जले छप्परों के मसीहा

बाज़ार में खरीदारों को
विक्रेता नए उत्पादनों से लुभाते हैं
तो अभी हाल कुछ नया नहीं हुआ
“मैं अन्ना हूँ” की टोपी ओढाने वालो ने
“मैं आम आदमी हूँ” की टोपी पेश की है
कीमत देश पर राज की कुर्सी है.
उन्हें नही मालूम खरीदार यानी
आम आदमी जिसके सर की
इन नये दुकानदारों को तलाश है
पहले से ही बिका हुआ है
धर्म-जाति की जंजीरों में जकडा हुआ है.
भूखा, प्यासा, अधनंगा, बेघर
चंद ठेकदारों के हाथों में बँधवा मजदूर है.
ओ भाई नए टोपीबाजो
तुम्हारा बेईमानी हटाने के जाल में
मुश्किल ही फँसेगे मासूम वो परिंदे
जिनकी मजबूरियों को
सुहाने कल के सपनो से क्या लेना देना
उनकी भूख को दो मुट्ठी राशन की तलाश है.
फुटपाथ पर खाने के पैकेट झपटने वाले
कारों के डिजाइन कब देखते हैं.
तन ढकने के लिए एक अदद सस्ती साडी
या फिर पांच सो का नोट तय करेगा
इनके बिकने की प्राथमिकता और
यदि वाकयी कुर्सी पर बैठना है
तुम भी कल गरीब मोहल्लों में
दारु बांटते नज़र आओगे.