सर्दी की कविता २

एयर कंडीशन हुए महलों से
छन कर आती रौशनी में
फुटपाथ ने देखा
बेघर आदमी और लावारिस कुत्ता
एक दूसरे से गर्मी लेने की जुगत में
लिपटे पड़े हैं.
सर्दी ने भी जब यह देखा
बोली बहन फुटपाथ
अय्याशी की समान आवश्यकता झगडे की जड है
और मजबूरी की समान आवश्यकता दोस्ती की जनक
क्यों है ना .
हाँ दीदी सर्दी ये दोनों अभागे
सूरज के शहर में दुत्कार के अधिकारी
गर्मी की भागीदारी के साथ सो रहे हैं
जब कि वो देखो महलों में
सूरज के शहर में सत्कार के अधिकारी
ज़र,ज़मीन, जोरू के झगड़े सर लिए
बेचेन करवटें बदल रहे हैं.
इतने में नन्ही किरण ने जाग कर कहा
महल को चिंता का रोग है
कभी पाने की चाह कभी खोने का भय
वह सदा का परेशान है और रहेगा,
जिसके पास ओढने को सिर्फ आसमान है
उसको क्या पाना क्या खोना
हर सुबह स्वयम को जीवित पाना
बड़ा सतोष है शायद .
और हुआ भी यही कि उगते सूरज साथ
नए दिन के स्वागत में
खुद को झाड कर आदमी
दम हिला कर कुत्ते
दोनों धूप में जा बेठे
उन्हें सहारे के लिए
किसी दीवार की भी ज़रूरत नहीं थी.

सर्दी की कविता

सर्दी में थरथराती फुटपाथ ने

दूर आकाश पर चाँद में  

बूढी अम्मा को चरखा कातते देखा

लोरी वो सुना रही थी

सो जा मेरी राजकुमारी सो जा.

ऊन मैं बना रही हूँ

बर्फ के गालों से

गर्मी भी कुछ चुरा लाऊंगी

महलों की रोशनियों से

बना कर तारे सजी ओढनी तेरे लिए

अभी भेजती हूँ कोहरे के साथ 

सो जा मेरी राजकुमारी सो जा.

तेरे जाने के बाद

अपनी मोत का भी पता चला था तुझसे

मेरी जान,यूँ ही तो नहीं कहा था तुझसे

अजब मुहब्बत का सिलसिला था तुझसे

सज़ा मैंने भी पाई कसूर हुआ था तुझसे

अभी राह में हूँ तेरी सिम्त लोटूगा ज़रूर

वहीँ कहीं जहां के पहले मिला था तुझसे

आसूंओं का रास्ता मयकदे में जा बिखरा

खो भी गया हूँ जो बिछड गया था तुझसे 

बेजान एक तकिये से लिपटी है रात अब   

बिस्तर कभी ज़िंदा हुआ करता था तुझसे

ज़ख्म तो हैं दिल में मगर अब दर्द नहीं

केसे कहें हमारा भी कोई वास्ता था तुझसे

तेरे साथ सूरज चाँद सब के सब राख हुए

यानि ओ नूर ऐ निगाह उजाला था तुझसे

जन्मों की प्रीत पल में बेगानी हुई आलम

क्या खबर थी साथ दो दिन का था तुझसे    

दूसरा मतला और तीसरा शेर प्रथम मानव-मानवी से मिलने के बाद पढ़ें तो शायद बात बने