हंसी बिखेरते बहरुपियों से

दिल है मुरझाया हुआ तो भी फूल सा खिला कर
हंसी बिखेरते बहरुपियों से मुस्करा के मिला कर.

परखता तो सही स्वार्थी रिश्तों में अपना है कोन
किसने कहा था तुझे जा के अपनों से गिला कर.

आस्तीन में खंजर के डर से मैं गले नहीं मिलता
अच्छा है दोस्त भी चले जाते हैं हाथ मिला कर.

सूरज घावों में मरहम के नाम से नमक भरता है
अँधेरे में ऐ दिल आँसुओं के धागों से सिला कर .

भीतर से देखो जड हैं जमे हुए हैं हम सब लोग
मुस्कराते फिर भी हैं अहसास की बर्फ हिला कर.

शाम तक के साथी होते है उजले सूरज के साये
रोज तन्हाई का ये ही है आलम कुल मिला कर .

कोई होता जिसको हम अपना ….

कागज़ के फूलों से बहलाते रहे हैं लोग

हमको सब्ज़ बाग दिखलाते रहे हैं लोग.

भीख में किसी ने जाने कुछ दिया होगा

वगरना तो वादों से बहलाते रहे हैं लोग.  

बताते हैं हमें बस्ती के झगडों की जड

और तलवारे बाँट कर आते रहे हैं लोग.  

कोई अपना नहीं न अफसर न मीडिया

चिराग चुन के हमारे बुझाते रहे हैं लोग.

इन्साफ बहरा हुआ फरियाद सुनेगा कोन

हमारी पुकार शोर में दबाते रहे हैं लोग. 

सजा जरूर दो मगर कोई गुनाह तो हो

घर-सोयों को मुजरिम बनाते रहे हैं लोग.

क्या आज खून पानी से भी सस्ता हुआ  

मन चाहे गली-कूंचों में बहाते रहे हैं लोग.

ड्युटी पर शहादत होती भी है तो हमारी  

वर्दीयाँ तक खून में नहलाते रहे हैं लोग.

कातिल के डर से कोई बयान नहीं देता   

सरेआम देखिये लाशें गिराते रहे हैं लोग.

गुनाहगार कोई हो कसूर हम पे ठहरेगा

बच्चों तक को आरोपी बनाते रहे हैं लोग.

वो बस्तिया भी आलम आदमीयों की थी

सूखी घांस सा जिन्हें जलाते रहे हैं लोग.

पक्षी जो नहीं रहेंगे

चिड़ियाघर में दिखे के पिंजरो में मिले हैं परिंदे
चंद कबूतरों के सिवा शहर में कब बचे हैं परिंदे

कुल्हाड़ों की सदा पर कांपता है दरख्त का दिल
आई सर्दी बचा तो गिनेगा कितने लोटे हैं परिंदे

बदलते मोसम के मिजाज़ की समझ थी उनको
घोसले बनाने आये थे घर लोटने लगे हैं परिंदे

शिकारियों का जाल हैं, कही घात कही गोलीयाँ
बिखरे पर गवाह हैं बे तादाद मारे गए हैं परिंदे

ज़हरीली हवाओं ने उड़ानों के होसले किये पस्त
तेज़ाब बनी नदियों ने भी बे पर किये हैं परिंदे

हरियाले खेत जहाँ थे कंक्रीट का शहर बस गया
बे आशियाना बे आबओदाना भूखे मरे हैं परिंदे

दरख्त काट कर हम मुंडेरो पर परीडे रख आये
चुग्गा जा कबूतरों को डाला यही बचे हैं परिंदे

एक ज़माना था रंग बिरंगे पक्षी थे बहुत आलम
अब कुछ कम्पुटरों के वालपेपरो पर रहे हैं परिंदे photos 254

मुझे इंसान रहने दो

न पंडा न मोलवी मुझे इंसान रहने दो
ना छाप ना बिंदी मुझे इंसान रहने दो

तुम करो शेतानी मुझे इंसान रहने दो
अरे शिया सुन्नी मुझे इंसान रहने दो

खंजरों को लहू डुबाते तुम फरिश्ते हो
चलो यूँ ही सही मुझे इंसान रहने दो

इबादतगाहों के सजदों को लूटने वालो
आप बनो गाजी मुझे इंसान रहने दो

बेगुनाहों के कत्लों का खुदा है गवाह
मैं नहीं जेहादी मुझे इंसान रहने दो

तुम फरिश्ते पीर बाबा सब जा बनो
आलम मैं पापी मुझे इंसान रहने दो