चुनावी मोसम में -7

सफेदपोशों को अपने पाप छिपाने के लिए

पर्दा चाहिए,मुखोटा चाहिए,अन्धेरा चाहिए

अखबारों-समाचारों,टीवी चेनलों और

छवि सुधारक माध्यमो का सहारा चाहिए

जिससे काले दिलों पर पहने कुरते उजले बने रहें.

लहू सने हातों के खंजर,घोटालों की फाइलें ,सेक्स टेपों के राज़

काले कारनामों की अनगिनत सूचियाँ

यूँ ही वक़्त के कबाड़ में बेहिसाब दफन किये जाते रहें.

ताकि मरने के बाद ये सब के सब बहरूपिये

शेर की खाल ओढ़े हुए भेड़िये

महानता का जामा पहनाया जाकर

स्मारकों ,मूर्तियों में ज़िंदा रखे जाते रहें.

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चुनावी मोसम में -6

कोई जगह बता सर छुपाने को है?

सुना है जल्द तूफ़ान आने को है

यहाँ सब हैं कुर्सियों के चाहने वाले

सूली की चाह किस दीवाने को है

मंदिर-मस्जिद वाले उधर को जाएँ

अपना रास्ता तो शराबखाने को है

देखो कब होते है चाक सीने अपने

कातिल फिर खंजर आजमाने को है

बड़े कहते है अपना कातिल है वही

वो जिसकी चाह इस जमाने को है      

जान जाए या रहे अब नही सोचते  

जी में दीवार से सर टकराने को है

अच्छे कल की आस में न हो खुश  

आलम ये वादे तो बहलाने को है

 

 

चुनावी मोसम में- 5

भीड़ के शोर का सन्नाटा मैं ही हूँ

आप लोग तो भले हैं बुरा मैं ही हूँ

दोर के देवता आये है मेरे दर पर

इन दिनों में इनका खुदा मैं ही हूँ

सियासत ने सदा किया मेरा कत्ल

कुर्सी के पायों तले कुचला मैं ही हूँ

भीड़ का हर है चेहरा मेरा ही अक्स

रुपहले वादों का भरमाया मैं ही हूँ

हर खुदा पत्थर निकलता है आखिर 

बंदगी में फरेब सदा खाता मैं ही हूँ  

 

 

शाम के बाद

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खुद को भी मिला नही शाम के बाद

कहाँ खोया मैं पता नहीं शाम के बाद

घर नहीं पहुँचूगा बस ये बात तय है

मेरा कुछ ठिकाना नहीं शाम के बाद

सब शरीफ लोग अपने-अपने घर गये

हमदम कोई अपना नहीं शाम के बाद

साए तक का साथ अँधेरों में खो गया

केसे कहूँ मैं अकेला नहीं शाम के बाद

कोई चिराग़ तो मिले के रात कट जाए

हमारे घर में उजाला नहीं शाम के बाद  

चुनावी माहोल में ४

हवा चल रही है

अच्छी बात है.

कच्चे हाथों में गुब्बारा

हवा भरने से बड़ा हो रहा है.

अखबारों,समाचारों,गलियारों में  

गुब्बारा बड़ा करने की होड़ लगी है.

एसा न हो

फूलते-फूलते फट जाए गुब्बारा.   

या फिर डोरीवहिन यह

उड़ जाय कहीं बेखबर.     

एक दिन का हिसाब

शहर की भीड़ में

आवाजें-फुसफुसाहट

अज़ान-भजन,कहकहे-रुदन,फरियाद-चीखें

हार्न-इंजनों की कर्कश ध्वनियाँ

कानों तक पहुँचते-पहुँचते शोर बन जाती हैं

न कोई सुन पाता है न किसी की सुनवाई होती है 

संवेदनहीनता के सिवा कुछ नहीं बचता.

जिसमें बिखरते बनते रहते है

माटी के चेतनाशून्य से खिलोने    

यूँ ही सुबह-शाम का सिलसिला

अनाम दिन बन कर गुज़र जाता है

ज़िंदगी सेटूट कर बिखर जाता है.

Aside

उचक लेते हैं गले का जेवर खुला 
छोड़ जाते थे कभी लोग घर खुला
मंदिर मस्जिद की राह जाने वालो 
क्या कोई मार्ग दिल के अंदर खुला ?
फुटपाथ पर यूँ सोई बहुतों की रातें
रद्दी बिछा कर समझा बिस्तर खुला
उछली ईट से भाल फुडा कर मजदूर  
मजाक में कह रहा है मुकद्दर खुला
अपने सिवा किसी का नहीं था साथ
शहर की भीड़ में राज़ मुझ पर खुला