एक महंगे दिन का दुःख

अन्धेरा दूर होगा

रौशनी मुस्कराएगी  

अच्छे दिन आयेंगे

इस गा….गी…गे  के फेर में

दबा हुआ हूँ मैं

कुचला हुआ हुआ हूँ

परन्तु फिर भी

सूरज की पहली किरण के साथ

जाग उठता हूँ

चल पड़ता हूँ

अच्छे दिन की तलाश में कि जो

बेरोज़गार भीड़ में गुम करके मुझे

दलालों, चाटुकारों, बहरूपियों, मीडियावालों की महफ़िलों में

मुनाफ़ाखोरी की दुकानों पर 

महंगाई के पेट से मेरी भूख जा निकालता है

यानी आलू, प्याज़, बच्चों का दूध सब कुछ

 फिर दोपहर  को पसीना पिलाने के बाद 

वो अच्छा दिन आखिर शाम के धुंधलकों में  

मुझे फुठपाथ पर छोड़ कर

गा..गी….गे का कोरस गाता हुआ

योजना फ़ाइल में जा दुबकता है

सरकार के साथ नर्म बिस्तर पे सो जाता है.