हुस्न कायनात की इब्तेदा …

हुस्न का अहसास

केनवास पर रंगों के इन्द्रधनुष से

नकल तो हुआ है मगर

फूल कब साकार हो पाया यथावत.

छेनियों की तराश से

ताजमहल बन तो गया है मगर

शाहजहाँ का सपना और सुंदर था शायद.

मेरे पास तेरे कई फोटो हैं मेरी जान मगर

आँखों में जो तेरी सूरत बसी है

वह इन कागज़ के टुकड़ों में कहाँ.

झिलमिल आंसुओं में बिखरे मंज़र हैं गवाह

कोई तुलिका, कोई छेनी, कोई कलम

उस हुस्न को न पा सके

जो अधूरा जूनून है

आशिक का,सूफी का,कवि का,संगतराश का,चित्रकार का.

हर कीर्ति नकल है उस साक्षात सोंदर्य की

जो रचयिता के ज़हन में सुंदरतम थी.

थक कर अक्ल आखिर यही सोचती है

हुस्न महसूस तो किया जा सकता है

पूर्णतया पाया नहीं जा सकता.   Mona_Lisa,_by_Leonardo_da_Vinci,_from_C2RMF_retouched

मशहूर फोटोग्राफर उदयराम जी द्वारा खींचें गये कुछ दुर्लभ फ़ोटो.

ये दुर्लभ फ़ोटो जयपुर में अपने समय के मशहूर फोटोग्राफर श्री उदयराम जी द्वारा खींचें गये हैं.उनके पोते मेरे मित्र लक्षमण प्रसाद को दीपावली सफ़ाई के दोरान एक पुराने एल्बम में मिले हैं.इनमें कुछ एतिहासिक हवामहल के, कुछ महाराजा मान सिंह II की बरात के दोरान के बताये गये हैं,कुछ एक पोलो मेच के दोरान के भी हैं .बाहरहाल ये चित्र पूर्व प्रकाशित नहीं हैं क़रीब सो वर्ष पुराने ये फ़ोटो कोई शक नहीं जयपुर की धरोहर हैं.मित्र लक्षमण प्रसाद से बातचीत के दोरान उनके कहे से ये मंज़रे-आम पर लाये जा रहे है.

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पंखनुची तितलियों का शोक गीत

तितली के पंख अगर तुमने

कोवे की चोंच में नुचते हुए नहीं देखे

अपने आस-पास ही किसी ओरत को

बेरहमी से पिटते ज़रूर देखा होगा.

तमाशा देखती खिडकियाँ कुछ नहीं बोलती

कोई दरवाज़ा भी वो हाथ नहीं पकड़ता

जिसकी चोट से बदन कम

दिल ज़्यादा घायल होते हैं.

यूँ ही बस्ती में अनगिनत सिसकियाँ

रात के अँधेरे में आप ही चुप हो जाती हैं.

सवेरे झाड़ू-पोछे में खनकती चूडियाँ

खुसरो को भी नहीं जानती जो गाएँ

“काहे को ब्याही बिदेस ओ लाखिया बाबुल मोरे”

शिकायत करे भी तो किससे

चुपचाप मांग में सिन्दूर भर लेती है

दर्पण को उदास करती ओरत.

केसे अच्छे दिन

गोर से सुनो ओ सड़कछापो

सदा के भूखे, नंगो.

हम नहीं लायंगे काला धन

महंगाई भी कम नहीं होगी.

सपनो में देखो तुम

रोटी, कपड़ा और मकान.

जाओ कुछ नहीं देते

बोलो क्या करोगे.

यही ना की अगले चुनाव में

हमारा सूपड़ा साफ़ कर दोगे.

तब तक मूर्खो

कितने ही बंगले होंगे हमारे

नोटों से अटे लाकर होंगे

सोने से लदी रखेलें होंगी हमारी.

जागती आँखों के सपने देखने वालो

तुम्हारे पास क्या होगा, हम बताएं.

वही भूक, प्यास और मुफलिसी

बेअक्ली भेड़ो तब भी तुम्हे.

हम या हमारे ही कोई भाई

वादों की छुरियों से हलाल कर रहे होंगे.     Poor_woman_in_Parambikkulam,_India

होशोहवास में बराबर केसे.

ढली शाम हो घर पर केसे/

फूलों की बात करने वाले.

ये हातों में हैं पत्थर केसे/

आँखों का पानी कहाँ गया.

सूख गये हैं समँदर केसे/

धरती माँ बिकी है वरना.

गावं आके बसे शहर केसे/

केसे आये है आलम साब.

हुई इनायत हम पर केसे /

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रात के पहर गिनता हूँ अभी तक.

आजा खुला दरवाज़ा हूँ अभी तक/

जिए जाने का गुनाह कर रहा हूँ.

तेरे बगेर भी ज़िंदा हूँ अभी तक/

रास्तो बताओ मेरा घर कहाँ गया.

अपने पते से बेपता हूँ अभी तक/

रूठने वाला तो बिना बताये गया.

कसूर खुद से पूछता हूँ अभी तक/

मुझे मालूम है कोई नहीं आयेगा.

क्यों रास्ता तक रहा हूँ अभी तक/

खुश्बू का झोंका था आलम गया .

उसे महसूस कर रहा हूँ अभी तक/photo-256889_640mmmmm

जिंदगी क्या है ?

क्यों है,क्या है,जाने किसलिए हैं जीवन

चलती साँसों की चला-चली में

ताकत,तक़दीर,ताबीर के फेसले होते है.

खेत-कारखानों से पसीना सोना बन कर

महलों की तिजोरियों में गुप्त हो जाता है कहीं

कहीं मुद्रिका-तलवार के आदेश आम हो जाते हैं

मुर्गा बन जाती है जनता

ताज-तख़्त हराम की खाते हैं.

वक़्त की हवा ले उड़ेगी

कल राख भी न बचेगी

ओ!राजा या रंक ये जीवन घुआं हो जायगा.

लहू की नदियों के रास्ते

सल्तनत की मंजिले तलाशने वाले

पता है क्या माटी मिले

खाली हाथो का सफर है आगे.

यूँ धूल का पुतला हैं हम सब जाने

जीते जी कब है मगर माने कि

ढाई ग़ज़ ज़मीन भी अपने हक में नहीं.

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