सनाउल्लाह खान”मीरा-जी” (मई 25, 1912–नवम्बर 3, 1949):चंद ग़ज़लें

बढे हुए बाल और मूछें,बेतरतीब कपडे,कानों में बड़ी बालियाँ,सर पर अक्सर रंगीन रूमाल धारण करने वाले मीरा-जी शायद पहले हिप्पीरूप थे. सनाउल्लाह से मीरा-जी बन कर “किसी मीरा” के दीवाने वे बेहिसाब शराब के समुद्र और सिगरेटो की चिता में सिर्फ ३७ वर्ष की उम्र में धुँआ हो गये.सीधा सादा परन्तु उनका गहरा कलाम जिसमें ग़ज़लें,नज्में और आज़ाद शायरी शामिल हैं सुनने–पढने वाले के दिल दिमाग और चिंतन पर गहरा असर छोड़ता हैं.उन्होंने छोटी सी जिंदगी में बहुत कुछ लिखा है.कई रचनाओं में हिंदी-उर्दू का सुंदर गंगा-जमनी मिश्रण आनंदित करता है.मीरा-जी के लेखन सागर से ये कुछ ग़ज़लें इन्द्रधनुषी बूंदों सामान पेश हैं

१.

हंसो तो साथ हँसेगी दुनिया बेठ अकेले रोना होगा

चुपके चुपके बहा कर आंसू दिल के दुःख को धोना होगा

बेरन रीत बड़ी दुनिया की आँख से जो भी टपका मोती

पलकों ही से उठाना होगा पलकों ही से पिरोना होगा

खोने और पाने का जीवन नाम रखा है हर कोई जाने

उसका भेद कोई न देखा क्या पाना क्या खोना होगा

बिन चाहे बिन बोले पल में टूट फूट कर फिर बन जाए

बालक सोच रहा है अब भी एसा कोई खिलोना होगा

प्यारों से मिल जाएँ प्यारे अनहोनी कब होनी होगी

कांटे फूल बनेंगे केसे सुख सेज बिछोना होगा

बहते बहते काम न आए लाख भंवर तूफानी-सागर

अब मंझधार में अपने हाथों जीवन नाव डुबोना होगा

जो भी दिल ने भूल में चाहा भूल में जाना हो के रहेगा

सोच सोच कर हुआ न कुछ भी आओ अब तो खोना होगा

क्यों जीते जी हिम्मत हारें क्यूँ फरियादें क्यूँ ये पुकारें

होते होते हो जाएगा आखिर जो भी होना होगा

‘मीरा –जी’ क्यूँ सोच सताए पलक पलक डोरी लहराए

किस्मत जो भी रंग दिखाए अपने दिल में समोना होगा

चाँद सितारे केद हैं सारे वक़्त के बंदी-खाने में

लेकिन मैं आज़ाद हूँ साकी छोटे से पैमाने में

उम्र है फ़ानी उम्र है बाक़ी इसकी कुछ परवा ही नहीं

तू ये कह दे वक़्त लगेगा कितना आने जाने में

तुझ से दूरी दूरी कब थी पास और दूर तो धोका है

फर्क नहीं अनमोल रत्न को खो कर फिर से पाने में

दो पल की थी जवानी नादानी की भर पाया

उम्र भला क्यूँ बीते सारी रो रो कर पछताने में

पहले तेरा दीवाना था अब है अपना दीवाना

पागलपन है वेसा ही कुछ फ़र्क नहीं दीवाने में

खुशियाँ आईं अच्छा आईं मुझको क्या अहसास नहीं

सुध-बुध सारी भूल गया हूँ दुःख के गीत सुनाने में

अपनी बीती केसे सुनाएँ मद-मस्ती की बातें हैं

‘मीरा-जी’ का जीवन बीता पास के इक मयखाने में

फानी-नश्वर

३.

गम के भरोसे क्या कुछ छोड़ा क्या अब तुम से बयान करें

गम भी रास ना आया दिल को और ही कुछ सामान करें

कहने और सुनने की बातें किसने कहीं और किसने कीं

करते कहते देखें किसी को हम भी कोई पेमान करें

भली बुरी जेसी भी गुजरी उनके सहारे गुजरी है

हजरते-दिल जब हाथ बढाएँ हर मुश्किल आसान करें

एक ठिकाना आगे आगे पीछे एक मुसाफिर है

चलते कहते सांस जो टूटे मंजिल का एलान करें

“मीर”मिले थे“मीरा-जी”से बातों से हम जान गये

फेज़ का चश्मा जारी है हिफ्ज़ उनका भी दीवान करें

फेज़-अनुकम्पा ,चश्मा–झरना ,हिफ्ज़-याद, दीवान-काव्य पुस्तिका

४.

जिंदगी एक अज़ीयत है मुझे

तुझसे मिलने की ज़रूरत है मुझे

दिल में हर लहजा सिर्फ एक ख्याल

तुझसे किस दर्जा मुहब्बत है मुझे

मुझ पे अब फाश हुआ राजे-हयात

जीस्त अब से तेरी चाहत है मुझे

तेज़ है वक़्त की रफ़्तार बहुत

और बहुत थोड़ी सी फुर्सत है मुझे

आह मेरी है तबस्सुम तेरा

इस लिए दर्द भी राहत है मुझे

अब न वो जोशे तम्मना बाक़ी

अब न वो इश्क की वहशत है मुझे

अब यूँ ही उम्र गुज़र जायगी

अब यही बात गनीमत है मुझे

अज़ीयत-तकलीफ़, फाश-खुला , राजे-हयात-जीवन रहस्य , जीस्त-जीवन

तबस्सुम-मुस्कान ,

५.

ढब देखे तो हमने जाना दिल में धुन भी समाई है

मीरा-जी दाना तो नहीं है आशिक है सोदाई है

सुबह सुबह कोन सी सूरत फुलवारी में आई है

डाली डाली झूम उठी है कलि कलि लहराई है

जानी पहचानी सूरत को अब तो आँखें तरसेंगी

नए शहर में जीवन-देवी नया रूप भर लाई है

एक खिलोना टूट गया तो और कई मिल जायेंगे

बालक ये अनहोनी तुझको किस बेरी ने सुझाई है

ध्यान की धुन है अमर गीत पहचान लिया तो बोलेगा

जिसने राह से भटकाया था वही राह पर लाई है

बेठे है फुलवाई में देखें कब कलियाँ खिलती हैं

भँवर भाव तो नहीं है किसने इतनी राह दिखाई है

जब दिल घबरा जाता है तो आप ही बहलता है

प्रेम की रीत इसे जानो पर होनी की चतुराई है

उम्मीद अरमान सब जुल दे जायेंगे जानते थे

जान जान के धोके खाए जान के बात बढाई है

अपना रंग भला लगता है कलियाँ चटकी फूल बनी

फूल फूल ये झूम के बोला कलियों तुमको बधाई है

आबशार के रंग तो देखे लगन मंडल क्यों याद नहीं

किसका ब्याह रचा है देखो ढोलक है शहनाई है

इसे डोले मन का बजरा जेसे नेन-बीच हो कजरा

दिल के अन्दर धूम मची है जग में उदासी छाई है

लहरों से लहरे मिलती हैं सागर उमड़ा आता है

मंझधार में बसने वाले ने साहिल पर जोत जगाई है

दाना-विद्वान,सोदाई –प्रेमी

६.

नगरी नगरी फिरा मुसाफिर घर का रस्ता भूल गया

क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया

क्या भूला केसे भूला क्यूँ पूछते हो बस ये समझो

कारन दोश नहीं है कोई भूला भाला भूल गयाMiraji

केसे दिन थे केसी रातें केसी बातें घातें थीं

मन बालक है पहले प्यार का सुंदर सपना भूल गया

अंधियारे से एक किरन ने झाँक के देखा शरमाई

धुंधली छब तो याद रही केसा था चेहरा भूल गया

याद के फेर में आ कर दिल पर एसी कारी चोट लगी

दुःख में सुख है सुख में दुःख है भेद ये न्यारा भूल गया

एक नज़र की एक ही पल की बात है डोरी साँसों की

एक नज़र का नूर मिटा जब एक पल बीता भूल गया

सूझ बूझ की बात नहीं है मन मोजी है मस्ताना

लहर लहर से सर जा पटका सागर गहरा भूल गया

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यायावर शायर साग़र सिद्दीकी(1928–1974) : चंद ग़ज़लें

उसकी मधुर आवाज़ सुनने दूर दूर से लोग मुशायरों में खिचे चले आते थे .उसके कलाम में जादू था इसीलिए बालीवुड ने सर आँखों पर बिठाया और कितने ही गीत फिल्मों के लिए लिखवाये .पर उसे जाने क्या प्यास थी सारी शोहरत को ठुकरा कर सड़कों पर आवारा फिरने लगा.उसकी अबूझ प्यास ने उसे शराब और मार्फीन के नशे में डुबो दिया .जिसकी तलब पूरी करने के लिए वो अक्सर अपनी ग़ज़लें कुछ रुपयों के बदले लोगों बेचने लगा या अपना लिखा फाड़ कर जलाने लगा.उसकी जिंदगी सड़क बन गयी थी और फुठपाथ घर. आखिर एक गुमनाम फुटपाथ पर वो मरा पाया गया.कभी महफिलों के उजाले साग़र सिद्दीकी के पास उस वक़्त सिर्फ पालतू कुत्ता खड़ा था जिसे  उसने सडक से उठा कर साथी बनाया था.सागर साहब की कुछ गजलें पेश हैं .

ltsagarहै दुआ याद मगर हर्फ़े दुआ याद नहीं

मेरे नग़मात को अंदाज़े नवा याद नहीं

मेने पलकों से दरे यार दस्तक दी है

मैं वो साइल हूँ जिसे कोई सदा याद नहीं

हमने जिनके लिए राहों में बिछाया था लहू

हमसे कहते हैं वही अहदे वफ़ा याद नहीं

केसे भर आयीं सरे शाम किसी की आँखें

केसे थर्राई चिरागों की जिया याद नहीं

सिर्फ धुंधलाये सितारों की चमक देखी है

कब हुआ कोन हुआ किससे खफा याद नहीं

आओ एक सजदा करें आलमे मदहोशी में

लोग कहते हैं के सागर को खुदा याद नहीं

जाम उठाओ वक़्त नाज़ुक है

रँग फेलाओ वक़्त नाज़ुक है

हसरतों की हसीन कब्र पर

फूल फेलाओ वक़्त नाज़ुक है

एक फरेब और जिंदगी के लिए

हाथ फेलाओ वक़्त नाज़ुक है

रंग उड़ने लगा है फूलों का

अब तो आ जाओ वक़्त नाज़ुक है

बज़्मे सागर है गोश बर आवाज़

कुछ तो फरमाओ वक़्त नाज़ुक है

३.

पूछा किसी ने हाल किसी का तो रो दिए

पानी में अक्स चाँद का देखा तो रो दिए

नग्मा किसी ने साज़ पर छेड़ा तो रो दिए

गुँचा किसी ने शाख़ से तोड़ा तो रो दिए

उड़ता हुआ गुबार सरे राह उड़ता देख कर

बादल फजा में आपकी तस्वीर बन गये

साया कोई ख्याल से गुजरा तो रो दिए

४.

मैं तल्खी ए हयात से घबरा के पी गया

गम की सियाह रात से घबरा के पी गया

छलके हुए थे जाम परेशां थी जुल्फे यार

कुछ एसे हादसात से घबरा के पी गया

मैं आदमी हूँ कोई फरिश्ता नहीं हुज़ूर

मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया

दुनिया ए हादसात है एक दर्दनाक गीत

दुनिया ए हादसात से घबरा के पी गया

काटे तो खेर काँटे हैं इससे गिला ही क्या

फूलों की वारदात  से घबरा के पी गया

सागर वो कह रहे थे पी लीजिये हुजुर

उनकी गुजार्शात से घबरा के पी गया

दस्तूर यहाँ भी अंधे हैं फरमान यहाँ भी अंधे हैं

ए दोस्त खुदा का नाम न ले ईमान यहाँ भी अंधे है

तकदीर के काले कम्बल में अजमत के खजाने लिपटे हैं

मजमून यहाँ भी अंधे हैं उनवान यहाँ भी अंधे है

ज़रदार तोफिक रखता है नादर की गाडी मेहनत पर

मजदूर यहाँ भी दीवाने है ज़ी शान यहाँ भी अंधे हैं

बेनाम जफा की राहों पर कुछ ख़ाक सी उड़ती दिखती है

हेरान हैं दिलों के आईने हेरान यहाँ भी अंधे है

बेरंग शफ़क सी ढलती है बेनूर सवेरे होते हैं

शायर का तस्वुर भूखा है सुलतान यहाँ भी अंधे हैं

भूखे का भगवान् कहाँ है ?

१.वो नन्हे हाथ जिनमें किताबें होनी चाहिए थी.

थामे हुए हैं भीख का कटोरा मस्जिदों के बाहर.

तारीख गवाह है उन्हें ज़िल्लत झेलनी पड़ती हैं.

कोमें जो नहीं निकलती अपनी जिदों के बाहर.

२. प्यास जिसे नाखूनों से कुँए खोदने चाहिए थे.

अफ़सोस शराबखानों में तस्कीन खोज रही है.

हम खुद अपनी माटी मिलाने में लगे हैं और.

दुनिया अपने वास्ते नई ज़मीन खोज रही है.

३.भीख के लिए फेले हुए ये हाथ काट दिए जाएँ.

या काली तिजोरियों के खजाने लूट लिए जाएँ.

हर क्रान्ति ने जन्माये ‘चोर के भाई गिरह-कट’.Poor_mother_and_child_in_Calcutta_in_1945

सर्वहारा होने की सज़ा है अभावों में जिए जाएँ.