चुनाव के विष बीज

पांच साला चुनाव के विष बीजों की पैदावारो
वक़्त की किताब में तुम्हारा कोई ज़िक्र नहीं होगा
जब शब्द अपना इतिहास बयान करेंगे .
तुम बासी अखबार की रद्दी की तरह
जाने कहाँ धूल अटे पड़े होगे.
वे लेखक,चित्रकार,विचारक,बुद्धिजीवी जिन्हें
आज तुम कोस रहे हो, बेईज्ज़त कर रहे हो
जिनकी ज़बाने काटने के लिए छुरियाँ तेज़ कर रहे हो
जिनके लिए तुम्हारे अँधेरे दिमाग में सूलियाँ तेयार हैं
वे तुम्हारे चापलूसों की फोज से कहीं अलग
उसूलों के सिपाही हैं.
तुम्हारी तुच्छ समझ को इसकी क्या खबर
कि जब तक शब्द का इतिहास लिखा जाता रहेगा
ये कलम धनी वक़्त की किताब में
अटूट सितारे बन कर जगमगाते रहेंगे.
अरे ओ अज्ञान की बोतल में केद
पल दो पल के झिलमिलाते जुगनुओ
तुम कब के मिट चुके होगे
एक चुनाव हारते ही
तुम्हारा कोई भी नामलेवा नहीं होगा.


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