धूप में बिखरे ख़्वाब

बतायें तुम्हे कांधे क्यों कर झुके हैं दोस्त

उम्र भर ये ज़िंदा लाशें ढोते रहे हैं दोस्त

लगती है दिल पे चोट तो रो देते हैं दोस्त

हमने कब ये कहा पत्थर के बने हैं दोस्त

अहसास के कारोबार में हर जिंदगी दुकान

लोग रिश्ते खरीद रहे हैं बेच देते हैं दोस्त

जी घुट रहा है इस ज़मीर फरोश बस्ती में

लेकिन करें क्या जीना है जी रहे हैं दोस्त

रिश्ते वो जो अपनी जान से भी थे अज़ीज़

ख्वाब बन कर धूप में बिखर गये हैं दोस्त

सोचते ही नहीं खुदा को भी मूंह दिखाना है

बंदे खूब सियाह को सफ़ेद कर रहे हैं दोस्त

ज़बान पर अल्लाह बगल में छुरी है आलम

इसीलिए मस्जिदों में बम फट रहे हैं दोस्त  

बात है बात का क्या

बात खुशबू बन कर फेलती है
जब ज़बान फूल जेसी होती है
बात गाली बन कर फूटती है
जब ज़बान गटर जेसी होती है
बात नफरत भरी ज़हर बन कर
आदमी की आदमियत मारती है
दंगे फसाद बल्वे मोत जनती है
बात मुहब्बत की हो तो है अमृत
जीवन जीने का जज्बा जगाती है
गीत ग़ज़ल आरती अज़ान जन्मती है
बात भीड़ का कर्कश शोर भी है
बात प्रेमियों का मधुर संवाद भी
बात आदेश भी विनय भी प्राथना भी
बात नारा भी आन्दोलन भी क्रांति भी
बात दंभ भरी हो तो अशांति भी
बात तुलसी कबीर ग़ालिब बुल्ले ने जब की
प्रेम के अलख जगे है
संस्क्रती को जान मिली है
बात चंगेज़ तेमूर हिटलर ने जब की
सभ्यता की ईमारत नीवं से गिरी है
मानवता बेमोत मरी है
बात वादा भी है बात धोखा भी है
बात गप्प भी बात मुददा भी है
बात नेता ने सूफी ने संत ने गरीब ने अमीर ने किसान ने है
हर भाषा में हर रंग के इंसान ने की है
ये और बात है किस बात के क्या मानी निकले
ज़बान के कहे शब्द रूहानी इंसानी या शेतानी निकले

ना होने का ख्याल

बादल को गुमान था

समंदर का जनक है वह

बूँद को वहम हुआ

वह सागर की है माँ

अहंकार भरी नदी ने सोचा

वह है जलधर की प्रयेसी.

बादल को ले उडी हवा

बूँद को माटी खा गयी

नदी को खुद में समा कर

कहीं नावें डुबोने वाला

कभी किश्तियाँ पार लगाने वाला

अथाह गहरा वह समंदर

अमृत-विष-नमक सब पचा कर

रोज़ सूरज उगता देख रहा है

चाँद को डूबता देख रहा है.

तुम हम की ओकात है क्या

विश्वविजेता थे चगेज़ओसिकंदर

उनकी कब्रों का भी नहीं पता

जब सब कुछ ही है मिटने वाला

वक़्त की तीखी तलवार से

जब कुछ भी नहीं बचने वाला.

फिर छिछला अहंकार है किस लियें

सोचो तो सही माटी के पुतलो

सबको होना है आख़िर फ़ना.

(सागर मिले कोन से जल में कोई जाने ना…. )

अनाम

अहंकार भरी बाती ने कहा
रौशनी मुझ से है
तेल बोला तेरी जान हूँ मैं
दीपक कब छुप रहता
बोला
मैं तुम सब का आधार
तभी अद्रश्य एक झोंका आया
बुझ गयी बाती
बिखरा तेल
दीपक हुआ ओंधा
अहंकार बना अन्धकार.
(कोयला भयी न राख)