तीन निराश ख्याल

1.

फिर एक बार

सूखे की मार झेल रहे

खेतो में फसल की जगह

मोत उग रही है.

सूखे मटकों का चीत्कार

भूखे-प्यासे-नंगों का हाहाकार

सवाल न बन जाए

शायद इसी लिये

बस्ती में शोर का जश्न मन रहा है.

जबान कटने के डर से

मैं तो चुप हूँ मगर

रोती हुई कलम लिख गयी.

आज समझ आया

नीरो ने केसे

जलता रोम देख कर

बांसुरी बजाई होगी.

2.

सूरज के ज़ुल्म से

तडक गयी ज़मीन देख रही है

प्यासे मटके

आप ही लुडक कर

अपनी जान छोड़ रहे हैं.

अब के फसल ने

दाना भी नहीं दिया

भूखे खेत ने ज़हर खा लिया.

हवाई जहाज़ नहीं था

किसान के पास

ना ही मधुबालाएं थी

वरना वह भी मरने के बदले

पहरेदारों को मदहोश कर

बैंकों का क़र्ज़ ले उड़ता.

3.

हवाई घोड़ों के सवार

हवा में उड़ गये हैं

इनके पावों तले की ज़मीन

साथ छोड़ चुकी है.

दुविधा यह भी है इनको

धरा पर उतरना नहीं आता.

जो थमी कहीं हवा

क्या ही पता

ये हवाई घोडे.

कमल भरी झील में गिरेंगे

या इनकी डोर

पुराने पंजे में कसी जायेगी.

 

 

 

भूखे-प्यास की तस्वीर पर काला रंग पोत दिया

वो नहीं चाहता था रोती सूरत कोई नज़र आए

हमारी रात तो फुटपाथ पर सोयी पड़ी रह गयी

जगमग वो सितारे जाने किसकी मांग भर आए

मुखोटे को चेहरा बताने की सजा मिलनी ही थी

शीशे सब के सब पत्थरों के सामने बिखर आए

खड़ी दीवारों से सर टकरा कर पस्त हुए हैं हम

अंगारों से गुजर जाएँ कहीं रास्ता तो नज़र आए

सलीबों की ज़बान को यहाँ पर कटती देख रहे हैं

कहाँ है मजाल के आह भी हमारे लबों पर आए

इंसाफ के पहरेदार बिकते देखे बे ईमान दोर में

इनाम पा के एडिटर लोटे माल ले के एंकर आये

अखबार चाकर हुए हैं चेनलों के एंकर सब नोकर

किसने देखे आँसू जो कलम की नोक पर आए

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई बस्ती में बहुत मिले

आलम ढूंढ कर हार गये आदमी ना नज़र आये

लकड़ीयों का ढेर बनने से पहले.

IMG_20160519_072622z.jpgसूखते पेड़ का झुका तना

अपने ही आस-पास

कुल्हाड़े की चोटों की आवाज

और कटती लकड़ी का चीत्कार

अनगिनत बार सुन चुका है.

अपनी आखरी हरी टहनियों से

झड़ते पत्तों की सरसराहट में

उसे लकड़हारे के आने की आहट

सुनाई देने लगी है.

सोच रहा है सूखता दरख्त

काश आखरी बार

बहार का गहना पहन पाता

लकड़ीयों का ढेर बनने से पहले.

सूखा

फूल पर ओस

आँख का आँसू

बरखा की बूँद.

कुल्हाड़ा फूल की माँ पर चला

पथराती आँख में नीर नहीं बचा

कंक्रीट के बोझ तले

बादल दब मरा.

शर्मदार के लिए

चुल्लू भर पानी भी नहीं

बेशर्म बस्ती में

मदिरा का दरिया बह रहा.

मरीचिका का ठगा प्यासा खेत

वो देख फंदे में जा लटका.

दो लघु कविताएँ

1

दर्पण बाहरी छवि दिखाता है

आत्म-मुग्घता भीतर जाने से रोकती है.

मित्र अतिशोक्त बखान करते है

शत्रु करते हैं केवल आलोचना.

सवाल यह है

अपने अंतर का कभी कोई

सच्चा आइना बन पायगा क्या?

2

समझो तो आसान है जिंदगी

इसे संवारने के लिए

ग्रन्थ-किताबें हैं

ग्यानी-उपदेशक हैं

रहबर-पथप्रदर्शक हैं.

बहको तो जिंदगी है मुश्किल

इसे बिगाड़ने के लिए

अशिक्षा–अज्ञान हैं

ढोंगी-बहरूपिये हैं

लुटेरे-रहज़न हैं.

 

गुजर जाती है ज़िन्दगी

हर युग में

भूखे नंगे बेघर लोगों ने

सपने देखे हैं.

यकीनन वे सपने

महलों में बसने के

नहीं रहे हैं .

महल बनाने वाले

अन्न उगाने वाले

मशीने चलाने वाले

बोझ उठाने वाले लोग

बस चाहते रहे हैं.

दो जून खाना

दो जोड़ा कपडे

दो कमरे का बसेरा.

पर चाहने से क्या होता है

वक्त की ठोकरों में

किरच किरच टूटे

सपनों का दर्द समेटती

अभावों की चक्की में पिसती

जिंदगी यूँ ही गुजर जाती है.

टूटे शीशों की आस

मेरी भूख-प्यास का बता कोई हिसाब भी है
तेरे नसीब में तो शराब भी है कबाब भी है

भूख-प्यास के सवालों पर बहाने तो हैं बहुत
ऐसे हालात क्यों कर बने कोई जवाब भी है

‘प्यादे से फरजी बना है चल रहा आड़ा-टेड़ा’
कुर्सी के हाकिम को ओहदे का रुआब भी है

जो हो जिंदगी के मुसाफिर को चलना होगा
सफ़र कड़ा है बहुत और रास्ता खराब भी है

तोड़ दिए गये शीशो अभी आस मत छोड़ना
फेंके गये पत्थरो में दिख रहा गुलाब भी है