विविध…..

पढ़ोगे तो भी किसी नतीजे पर पहुँचोगे नहीं।

हम फटे पन्ने वक़्त की अबूझ किताब के हैं।।

अश्कों ने लिखा है रोता हुआ मुकद्दर हमारा।

ये ज़िन्दगी के दिन टुकड़े किसी ख़्वाब के हैं।।

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ये आहटें किसी और के घर की तरफ़ जा रही होंगी।

मुझे मालूम है मेरे दरवाज़े पर कोई नहीं आने वाला।।

इस शहर में दुश्मन नहीं मेरा तो कोई दोस्त भी नहीं।

ख़ुदग़र्ज़ ज़माने में कहाँ है कोई साथ निभाने वाला।।

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ख़्वाब और हक़ीक़त के बीच का फर्क इस बात से समझ।

आंखों ने मंज़िल देख ली पर सफ़र का फ़ासला बहुत था।।

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हर रँग सियाही में उतर गया क्या।

हम ज़िंदा हैं दिल मर गया क्या।।

सारी दुनिया से हो आज नाराज़।

कोई अपना चोट कर गया क्या।।

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