दो कविताएँ

मैं आज
हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई
गरीब-अमीर
सवर्ण-शूद्र सब कुछ हूँ
आदमी के सिवा.

हवा, पानी, भूख, प्यास सबकी
एक रंग हैं
सूरज, धूप, चन्द्र, चांदनी, अन्धकार
सबके एक से हैं
मुस्कान,अश्रु,श्वास,अंतत मोत चेहरों के आधार पर
कभी भाग्य रेखाएं नहीं पढते
आदमी का बटवारा नाम ने किया
रंग ने किया नस्ल ने किया
आदम के एक से दो होते ही
मानवता के सबसे बड़े दुश्मनों
ताकतवर और कमज़ोर का जन्म भी हुआ
इतिहास की किताब में लहू रंग पन्ने गवाह हैं
सुर्ख सियाही सदा निर्बल के खून से बनती है
शक्ति आधार है शेतान की भगवान की
और सबसे बड़ा सच है
ये दोंनो कभी गरीब के नहीं.

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नरक हुआ शहर

अपना भी हो घर यह सपना लिए
आदमी को सिर छुपाने की जगह चाहिए
वह ठिकाना रेल की पठरियों से लेकर
सरकारी सूखे तालाब के बीच कहीं भी हो सकता है.
सवाल आपकी जेब में पैसे का है
रुपया तय कराता है दलाल
भूमाफिया या फिर अफसरों की घूँस का लक्ष
जिसकी कीमत के अनुसार बेतरतीब बसावट में
घर की ज़मीन का हिस्सा भी तय होता है .
यूँ ही बस रहा है शहर जाने कहाँ तक
प्यासा ,अंधेरा ,सूखे का सताया
बाढ का मारा, दुखियारा- बेचारा.
शहरीकरण की प्रकिया
सुना है कभी सुव्यवस्थित हुआ करती थी
चोपड,चोकडीयाँ-मोहल्ले सब अपने स्थान पर.
तब नक्शानवीस ,इंजीनियार और प्लानर
सरकारी बंगलों या किराए के घरों में रहा करते थे
समझो तो मैं बात इमानदारी की कर रहा हूँ.
वे भले लोग
सेवानिवर्त होकर चले जाते थे अपने गावं
आज के देख रहे हो
एक जोड़ा कपडे से कुर्सी पर बैठते है अफसर और
जब उतरते हैं या जबरन उतारे जाते हैं चोर!
अट्टालिकाओं के मालिक होते है.
समझो तो मैं बात इमानदारी की कर रहा हूँ
जो अब किस्से कहानियों में है बस या फिर
दुकानों में बिक रही है
थोड़ी पाप की कमाई खर्च कर कोई भी
विज्ञापनी ईमानदार बन सकता है.
.पक्का ..सच्चा समाज शिरोमणि .

वह समय तो गया

आज यूंही भटकते में एक घटना ने बचपन याद दिला दिया और खूब याद दिलाया.वो दिन थे जब बच्चों के लिए कम्पुटर घर घर तो क्या देश में भी नहीं आये थे.तब कोई बाजीगर या मदारी मोहल्ले में आजाता तो समझिए ईद हो जाती थी.भाग कर घरों से एक पैसा दो पैसे ले आते और खो जाते बाजीगर और उसके चेले के तलिस्मी जादू में.कुछ देर में कालियों के साथ खेल खत्म पैसा हजम. भाई! आज के डेरिमान जेसे कम्पुटरी कामिको वाला दोर  बच्चों को उदंडता, बेईमानी, चालबाजी यहाँ तक कि बेअक्ली की नकल में आत्महत्याओं की ओर धकेल रहा है.वो थे मासूम समय के खेल तब मदारी भी ताऊ कहलाता था. आज के माहोल ने तो पिता के दर्जे को भी ‘डेड”कर दिया.खेर बन्दर-भालू वाले बहला कर चले जाते थे और फिर शुरू हो जाता गुल्ली-डंडे–कंचो वगेरा का खेल.उस दोर में अगर सर्कस आ जाता शहर में तो क्या ही कहिये .बच्चे, जवान, बूढ़े सभी उस मैदान की तरफ रवाना हो जाते जहां हाथि- शेर –बघेरे -मोत के कूए और जोकर भरपूर मनोरंजन कर जाते थे.जाने कहाँ गए वो दिन ..

ओह !वह घटना तो रह ही गयी ,जरूरी है उसी के कारण तो यह सब लिखा है , सो बताता चलूँ .आज आवारगी सवेरे ही हवामहल की तरफ ले गयी.हवा महल के ठीक सामने कोई दस बारह गोरो का झुण्ड खडा था और बीन की लहरिया ट्राफिक की कर्कश ध्वनियों को हराती हुई माहोल में उभर रही थी.नागों का जोड़ा खुले में लहरा रहा था और गोरों के जोड़े भी बल खा रहे थे चूमा चाटी कर इठला रहे थे.कोई चक्कर नहीं अश्लीलता का न खुले में नागों के प्रदर्शन से कोई डर.गोरे सो-दो सो रुपयों  की बक्शिशे देकर विदा हुए.मुझसे रहा नहीं गया .मैंने पूछ ही लिया क्यों ? नागों पर तो पाबंदी है ना फिर…..सपेरा पगड़ी उतार कर बोला साहब नाग पालने के इलावा हम कोई काम नहीं जानते भेज दो जेल रोटी तो मिलेगी .मेरे अहसास पर जेसे बिजली सी गिर थी …मदारी ..भालू ..बन्दर वाले ..तोतो से किस्मत बताने वाले और सारे सर्कस जो मर गए हैं, वे सब एक साथ मेरे सामने आ खड़े हुए हाथ फेलाए हुए.मैं लाजवाब और चुपचाप आगे निकल लिया था. कुछ ही दिनों पहले खबर थी रेस्कू सेंटर में अधिकतर सर्कसों से लाये जानवर मर रहे हैं ..तो उनके मालिक ..कहाँ गए उनको क्या हुआ होगा उन्हें .खबर ये भी थी जंगलों में बचे खुचे बाघ- शेर सब शिकारियों के निशाने पर हैं.कहाँ हैं क़ानून बनाने वाले.कहाँ  हैं क़ानून का पालन कराने वाले .सवाल ही सवाल थे साहब! सुबह से दिन खराब कर गए अपना Image.    

आओ सो जाएँ

यही तो कहा था किसी सूरत सुला मुझको

मैंने कब चाहा था ख्वाब भी दिखा मुझको

तेरी कसम मिटटी में जाकर मिल जाऊँगा

तू इस तरह तो पलकों से न गिरा मुझको

….

रात गए तक मैं

दफ्तर को सिर से नहीं

उतार सका हूँ.

तुम शायद बेटे के अभी तक

घर नहीं आने से

चिंतित हो.

मैं उठ कर सिगरेट जला लेता हूँ

तुम पानी का गिलास पी आकर

करवट बदल लेती हो.

उबासियों में हैं आँखे

तुम्हारी भी मेरी भी.

साथ सोये ही नहीं वरना हमें

नींद भी आ जाती.

 

ढाई आखर नहीं मिले

शब्द

छोटे बड़े

हलके भारी

गज़ल गाळी

सब पा लिए

तलाश थी

नहीं मिले

ढाई आखर

प्रेम के.

2

तुम्हारी जिद यही तो थी

मैं गलत हूँ

मान लिया गलत हूँ .

अब शिकायत है कि

बस तुम्हारा मान रखने के लिए

मैंने खुद को गलत माना है.

मेरी दोस्त तुम्ही बताओ

फिर सही क्या है.

परिंदे से कोई कहो अपने पर समेटे
बस्ती की गुलेलों ने हैं पत्थर समेटे

यूँ ही नहीं हुई विष अम्रत की बाँट
कोई है नीलाभ जिसने समंदर समेटे

अदना सा आदमी है इतराता फिरता
माटी ने जाने कितने सिकंदर समेटे

बरखा कहती है इसमें कोई भेद नहीं
बूँद अपने आप में है समंदर समेटे

आओ आलम शाम हुई घर को लोटे
सूरज भी सोया धूप के बिस्तर समेटे

कहाँ चला जाता है कोई

आकाश से तारा उतर आता है कोई
आँखों में समंदर भर जाता है कोई

अँधेरे से जब बहुत घबराता है कोई
अपने खून से दिया जलाता है कोई

जाते देखा था दुनिया के कोने तक
आखिर में कहाँ चला जाता है कोई

पंछी तक नीडो की तरफ लोटते हें
शाम हुए जाने किधर जाता है कोई

मेरी तलाश को तो पता नहीं मिला
बंद आँखों से तुझ को पाता है कोई

मेरे पहचानी आहट कबकी गुम हुई
कोन आया जाने कोन जाता है कोई