सूरज उगने के पहले दिन से…

अच्छे दिनों का फरेब कोई नया नहीं है

सूरज उगने के पहले दिन से

सर्वहारा अपने हिस्से का उजाला तलाशता रहा है

मगर हर युग में हुआ ये है

बलशाली ने निर्बल का शोषण किया है

जहां तलवारों से गर्दने नहीं काटी जा सकी

वहां चालाक ज़बानों ने भोले-भालों को छला है

निरंकुश ताकतों के हंटरों ने

किस युग में नंगी कमरों की चाम नहीं उतारी

अनगिनत दबे कुचल गये गुलाम जिन्होंने

पेरामिड के अदभुत पत्थरों को उठाया

मर गये शाहों के साथ, ज़िंदा दफन कर दिए गये बेचारे

ताज महल बना कर हाथ कटवा बेठे

वो के जिन्होंने संगे-मरमर में चांदनी बसाई थी

गोर से देखो महानता के तमाम किस्से

लहू-पसीने की सियाही से लिखे गये है

महलो ने सदा थरथराते झोंपडो की धूप खाई है

भूखे प्यासे नंगे वंचित-जन की किस्मत में

हमेशा ठोकरें हैं, लानत है, मजबूरी है, रुसवाई है

अच्छे दिन कभी नहीं आयेगे,न आते हैं

शासक वही निर्मम चेहरे होते है

 बस मुखोटे बदल जाते हैं .   

 

 nubian-slaves

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दीवाने की बात

जाने किसने की थी साथ निभाने की बात

सुबह की भूली हुई वो शराबखाने की बात

सूलियों से ज़हर के प्यालों तक पहुँचती है

तुमसे ना समझी जायगी दीवाने की बात

प्यास जिन्हें थी वो आखिर ज़हर पी गये

समंदर करता रहा अमृत छकाने की बात

नदी से समंदर की गहराई का भेद न पूछ

कर तो कोई मुहब्बत में डूब जाने की बात

अभी तो हमें रूठे आँसुओं का है इंतज़ार

फिर कभी करेंगे यार मुस्कराने की बात

ताकि सनद रहे….

722px-A._Y._Jackson_-_Gas_Attack,_Lievinमरघट के से अँधेरे में रौशनी की बात करो
ख़ुदारा कोई तो यहाँ ज़िंदगी की बात करो
लोग नफरतों के परचम उठाए फिर रहे है
प्यार के सूने रास्तो आशिकी की बात करो
भीड़ के शोर में होश का कोई उपाय तो हो
ग़ालिब सूर मीर बुल्ले तुलसी की बात करो
फिर फरेब हो गया है हमारे भरोसों के साथ
टूट गयी आसो कुछ मसीहाई की बात करो
ज़बान कटने से पहले गालो सूलियों के गीत
सर उतरने से पहले सरफरोशी की बात करो
आहो चीत्कारों में बज रहा है मोत का साज़
इस जानलेवा शोर में खामोशी की बात करो
मयकदे के सब जामों में आँसू भरे हैं आज
मरीचिकाओं के रास्ते रवानगी की बात करो
मर गयी मानवता तो गाओ शोकगीत आलम
किसने कहा के तुम झूंठी ख़ुशी की बात करो

बाज़ार है सब कुछ

बड़े दुनियादार हैं तुम भी हम भी
देखो तो बाज़ार हैं तुम भी हम भी
सब बिकाऊ हैं हो भाव लगाने वाला
यूँ बड़े ईमानदार हैं तुम भी हम भी
चोरी लूट फसाद अपन ही से तो है
खबर हैं अखबार हैं तुम भी हम भी
अपने आपे को टटोला तो यह जाना
कितने गुनाहगार हैं तुम भी हम भी
वो लोग जज्बातों के बड़े कारीगर हैं
पर उनके ओजार हैं तुम भी हम भी
नफरतों के ताज़ा बँटवारे में आलम
तलवारो की धार हैं तुम भी हम भी

माटी का मोल …

झुकी कमर और कांपते शरीर के साथ
वह जा रहा था शहर की भीड़ में जाने कहाँ
लाल-पीली-हरी बात्तियों में
चोराहे पर धुंआ उगलती कारों के पार
साया बन कर खो गया वह
जो आदमी का अस्तित्व था.
काली सड़क पर शोर है
दिशाहीन आवाजें हैं
सपाट संबंधहीन चेहरे हैं
निरन्तर भागमभाग है
मरीचिकाओं में मरीचिका की तलाश.
तुम लाख ढूंढो कभी नहीं मिल पाओगे
गावों की उन पगडंडियों से
जिन्हें समय का गुबार
कन्क्रीटी भूलभूलय्या में खो आया है.
बस यूँ ही किसी दिन चलते चलते
तुम लापता जाओगे,बेनामो निशान
उन मंजिलों के फेर में
जहां से हमेशा नया रास्ता निकलता है.
आखिर होगा यह कि
झुकी कमर और कांपते शरीर के साथ
सायों में तुम साया बन जाओगे
ढाई इंची तीये की बैठक की एक वक्ती खबर.

वे लोग ……ये लोग …

01-10-09GazaProtest_WashDC-bgazaवे लोग गेस-चेम्बरों से

बच आई नस्लों की पैदाइश हैं

उन्हें घुट्टी में दी गयी है लहू की खुराक

दूध की जगह नफ़रतों का मवाद पिलाया गया है

सुंघाई गयी है जलते इन्सानी गोश्त की बदबू

मोत के घेरों से उन्हें ज़िंदगी का पैगाम दिया गया है.

इज़राइल के वे नामलेवा आज

कटीले तारों के बन्धनों में मानवता को करके केद

नीले तारे की रौशनी बिखेर रहे हैं.

बारूद के समन्दर में डूब गये रेगिस्तान पर

खजूर और जेतून के मीठे दरख्त थे कभी

अब वहां बमों की फसलें उगती है.

आदमी के हाथ-पैर-सर बिखरे पड़े हैं यहाँ वहां

भूरी आखों वाली मासूम अप्सराओं के बेगुनाह जिस्म

संगीनों से छेद दिए गये हैं

बिलखती गोदों के न कोखों के बच्चे बचे हैं.

दुनिया खामोश है चुपचाप देख रही है

दूध को तरसते मासूम

बेदवा दम तोडती जिन्दगियाँ

पत्थर हो गयी नन्ही पुतलियाँ .

हमेशा की तरह आज भी कोई

कमज़ोर की हिमायत में नहीं बोला.

फिलिस्तीन का एक और दिन लहू नहा जाता है

और सियाह रात फिर धमाको से दहल जाती है

हाँ मोत आती है, वहां बेमोत आती है.