नज़ारा तो है सामने….

नज़ारा तो है सामने लेकिन सूरत पसे नज़र क्या है

आईना भी कब दिखा पाया अक्स के अंदर क्या है

सतह के फैलाव पर न ठहर गहराई में उतर के देख

पानी का एक कतरा नहीं है तो फिर समंदर क्या है

अमृत की तलाश में कितनी ही बार पी लेने के बाद

आदमी ने ये खूब जान लिया आख़िर ज़हर क्या है

भरोसा ही तो है के अनदेखे को ख़ुदा कहते है लोग

बात अक़ीदे की है वरना बुतकदे का पत्थर क्या है

किस्मत में लिखी थी आवारगी तो समझते भी कैसे

ठौर ठिकाना किसे कहते है औऱ अपना घर क्या है

एक कदम बढ़ा था गलत राह में फिर उसके बाद

सारी ज़िन्दगी ये न जान पाए आखिर सफ़र क्या है

दुनियादारी का चलन तुम खुद कहाँ समझे आलम

फिर ख़ुदग़र्ज़ ज़माने से शिकायत इस क़दर क्या है

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अर्थहीन सफर …

ख़ुदा की तलाश में सारी दुनिया है

क्या कोई ख़ुद को भी ढूँढ रहा है

यूँ  इस जहान में कोन किस का है

हाँ है, वो कि जिसका नाम ख़ुदा है

माना तूने अपनी ज़िद हासिल की

मगर किस कीमत पे मिली पता है

मुझको तो खुद पर भी यकीन नहीं

कैसे कहुँ के दुनिया पर भरोसा है

रिश्तों के सच को समझे तो जाना

इस जहान में हर शख्स अकेला है

उंगलियां ज़ख़्मी हुई, होनी ही थीं

काँटों ने दोस्ती का तोहफा दिया है

दिल का हाल मुखोटे क्या समझेगे

उदास चेहरा हालात का आईना है

बता तो सही तेरा चेहरा भी है कोई

खूबसूरत है माना जो तेरा मुखोटा है

सर झुकाने के सिवा कोई चारा ही नहीं

मसलेहतो का मजबूरियों पर पहरा है

रिश्तों का भरम भी खुल गया आलम

मुझ को बड़ा वहम था यह घर मेरा है