खुदकशी

समय की बात है कभी

लोक लाज से मरते थे लोग

आज की जीवनशेली के तनाव से.

किसान को

सूखी फसल की चिता

जला रही है.

छात्र के लिए किताबें

कफ़न बन रही हैं.

सपनों की ऊँची उड़ान

कितनी ही प्रतिभाओं को

माटी में मिला रही है.

सफलता के शार्टकटो का चलन

अक्सर हताशा जन्मा रहा है.

नाकामी के सामने

धीरज से डटने के बदले

आदमी अकाल मरा जा रहा है.

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दो लघु कवितायेँ

1
आसान है इलज़ाम लगाना
उससे भी आसान है
आरोप का खबर बनना
सबसे आसान है
उस खबर पर
विश्वास कराया जाना.
2
सच के तलाशी
कितने ही सुकरातों ने
वक़्त के दर्पण में
अपना चेहरा देख कर
ज़हर के बदले
शराब के प्याले उठा लिए
वे जान गये थे
सबसे बड़ा झूठ
आज का सच है

तीन लघु कवितायेँ

1.
सीडियां चढ़ते क़दमों
कितनी ही मंजिलों से गुज़रो
आखिर छत पर रुकना होगा.
वहाँ से भी आकाश
उतना ही दूर नज़र आयगा
जितना ज़मीन पर दिखता है.
2.
बुलंदियों का हासिल है क्या
ऊँची उड़ान का दम भरते
बादल जाने कहाँ जाते हैं
पतंग-गुब्बारे फट जाते है
पंछी भी आखिर थक कर
नीचे उतर आते हैं
किसके हाथ आता है आसमान.
3.
ज़मीन पर रहें पावँ तो अच्छा
गीले-सूखे मोसमों से बेपरवाह
समय की करवटों का गवाह
पर्वत बन अडिग.
या मील का पत्थर बन
जो जानता है
रास्ता अपनी दिशा पर स्थिर है
आवागमन में सिर्फ मुसाफिर है.

आँखों आगे तालाब सूखे हैं, पानी आँखों में आया है

यही कोई चालीस बरस पुरानी बात है, गावं के कुए पर देखता था, सब रस्सी बाल्टी से पानी खींचते, वहीं स्नान करते फिर कांधे पर पीने मटका और घरेलु उपयोग हेतु एक हाथ में पानी भरी बाल्टी लिए लोट आते थे.तब गावं के कच्चे रास्तों पर कहीं पानी बिखरा दिखाई नहीं देता था.

फिर पक्की पानी की टंकियां बननी शुरू हुई.घर-घर नलकों की लाइने बिछ गयी और एक बाल्टी पानी से संतुस्ट होने वाला आदमी दस बाल्टियां बहा कर भी कम पानी मिलने की शिकायत करने लगा.जबकि पानी तो व्यर्थ ही गलियों में बहने लगा था.

गावं के शहरीकरण की होड़ में खेत बिकने लगे,घने हरे पेड़ कटने लगे. यहाँ तक कि गवाई तालाब तक जाने वाले नाले पाट कर, वहाँ भी लोह-कंक्रीट के जंगल आबाद कर दिए गये.तालाब की नसें कटी तो सूख गया, मर गया बेचारा तालाब.नतीजे में वह भूजल जिससे कुवों का जलस्तर बना रहता था वे सब निर्जल हो गये.

तथाकथित विकास अपने साथ विलासिता के नए रोग लेकर आया और कमरे-कमरे कूलर लग गये.जिनमें कीमती पानी का सबसे अधिक दुरूपयोग हुआ.कोल्ड-ड्रिंक,शराब के कारखाने जेसे जल का दुरूपयोग करने वाले उधोग भी स्थपित हुए जो आवश्यता नहीं विलासिता के प्रतीक हैं.

कट गये पेड़,मिट गये खेत.पहाड़ियां जो मानसून को क्षेत्र में रोकती थी, अवेध खनन की भेट चढ़ गयी.ऊपर से तरह तरह के जान लेवा प्रदूषण ने भी बादलों को विचलित किया.बरसात कम होने लगी और होती भी तो तालाबों बांधों तक जल पहुंचाने के रास्ते कट गये थे.पानी व्यर्थ बह जाता था. नतीजे में धीरे धीरे छोटे-बड़े लगभग़ सभी तालाब-बांध सूख गये.

अब हाल यह है की कई कई दिन शहरों में पानी नहीं मिल रहा.कहीं पानी रेलें चल रही हैं.कहीं टेंकर प्यास बुझा रहे हैं तो कहीं दूर दराज से पाइप बिछा कर पानी लाया जा रहा है.सोचने की बात है, क्या यह जल समस्या का स्थाई समाधान है.बिलकुल नहीं,यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सबको प्यासा मरना पडेगा.

स्वार्थी मानव केवल अपने आज के लिए जी रहा है.व्यक्ति हों, संस्थाए हों कि सरकार सब हर साल अच्छे मानसून की दुआ करते है.फिर सूखा पड़ने पर तरह-तरह की योजनाये बनाई जाती हैं, जिन पर कभी भी गंभीर अमल नहीं होता.यूँ ही समय हाथ से निकला जा रहा है और सुरसा के मूँह की तरह शहर बड़े होते जा रहे हैं.गावं सिकुड़ते जा रहे है.पानी की ज़रूरत बढती जारी है आपूर्ति की कोई ठोस योजना नहीं है.

अब भी वक़्त है लोगो! लोट आओ परंपरागत जीवन तरीकों की ओर जिनमें अन्य सामाजिक समस्याओं के निराकरण के अतिरिक्त जल संचय और उसका सुचारू उपयोग के तरीके भी आजमाए हुए और सिद्ध है.विकास के तेज़ रफ़्तार हवाई जहाज़ में उड़ना अच्छी बात है पर पाँव धरती पर रखे जाए तो अब भी आने वाली पीडीयों के लिए हम अच्छा देश छोड़ जा सकते हैं.

फूल बन कर जीना

काँटों की गोद में बेठा फूल
अपना दर्द छुपा कर
ओस की मुस्कान चुराता है.
तितलियों के सतरंगी पंखों से
अठखेलियाँ करता है.
सुबह की शीतल पवन में
चिड़ियों के मासूम गीतों पर
लहराता है.
वो जानता है
सूरज की जलती नजर
उसे लगने वाली है.
उससे पहले कि रेशमी पंखड़ियाँ
मुरझा कर बेरंग बने.
माहोल में
अपने हिस्से की
खुशबू लुटा जाता है फूल.
(जिंदगी वही है
जिसका निश्चित रास्ता हो
मोत आखरी मंजिल सही
सफ़र मगर सोचा-समझा हो)

केसी इंसानियत

जिसे भी देखो
इन्साफ, ईमान और इंसान
की बात कर रहा है.
जिधर भी देखो वही आदमी
झूठ. मक्कारी, कमज़र्फी से
उसूलों को कत्ल कर रहा है.
चेहरे पर मुखोटा
मुखोटे पर मुखोटा
बहरूपिया हुलिया ही भूल गया.
कथनी करनी का खेल देखा अजीब
चाटूकारिता में है नाम-इनाम
सच्चे लोगों के लिए सलीब.
दुनिया की दुनियादारी ने
आखरी ये सबक दिया
मानव नाम में ही है खोट
मानवता ढकोसला है.

छले गयों का मसीहा कोई नहीं.

वक़्त की किताब को जब भी पढ़ा
सियाह पन्नों में
यही लिखा देखा
ताकतवर ने अपना भाग्य
कमज़ोर के शोषण से बनाया है.
हंटरो से उधेडी गयी चमड़ी पर
पेरामिडो की नीव रखी गयी
ताजमहल को तराशने वाले हाथ
तलवारों से कलम कर दिए गये
तलवारों की जगह मिजाइलों ने लेकर
शहर के शहर राख किये.
अनगिनत मिसालें है कि जब
ताकतवर ने कमज़ोर को
जब्र से दबाया कुचला मिटाया.
इंसान होने की त्रासदी ने यह भी देखा
कि धरती के खुदाओं ने
आसमान का ठेका भी अपने नाम कर लिया .
पुरोहित, मुल्ला, पादरी
कमज़ोर को धर्म विधान का पाठ पढ़ाने लगे
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर ने
धर्मयुद्ध, जिहाद, क्रुसेड की नाम पर
धरती पर नरक का जीवन जीने वालों को
स्वर्ग का रास्ता दिखा दिया
यानी चेन से जीने नहीं दिया
बेमोत मार दिया.
लहू की नदियाँ आज भी
नफ़रत का समंदर भर रही हैं
अंतहीन है धर्म के नाम पर शोषण
ताकतवर का यह सब से बड़ा हथीयार है
जिसे सत्ता के दलाल धर्माधिकारी
जाने कब से इस्तेमाल कर रहे हैं.
ताकतवर के हिस्से का आसमान
महलों में बसता है
कमज़ोर के खाली हाथो में सिर्फ दुआ आती है
लाख संत-पीर ढोको मगर
पेट पर रखे पत्थरों को
भूख से आजादी कब मिलती है .
इन्साफ, बराबरी, नेतिकता के जुमलों ने
क्रांतियों को जन्म दिया
अफ़सोस! वक्त के हर रहनुमा ने
ताकत पाते ही ज़ुल्म किया
हमेशा कमज़ोर बहुजन को ठगा.
कमज़ोर ने जब भी
सत्ता की ताकत से
अपना हक मांगने की हिम्मत की
बाहुबलीयों ने ज़बाने काट ली
सर कलम कर दिए गये
शोषितों की आवाज़ दबाने के लिए
किस कालखण्ड में कत्लेआम नहीं हुए?
ज़ुल्मों का कोई हिसाब नहीं
जालिमों का कोई शुमार नहीं.
आज भी रोटी खोजती फिर रही है फुटपाथ
मांस–केक की झूठन छोड़ रहे महलों के कुत्ते
शेर की खाल ओढ़े भेडीये तो बहुत हैं
छली गयी जिंदगियों का मसीहा कोई नहीं.
ख्वाब बेचना नफे का व्योपार बन गया है
जिसे देखो वादों की दुकान खोल बेठा है.
खेतों की खुदकशी पर मलाल की किसे फुरसत
टहाको से गूज रही हैं कमज़र्फों की महफिले.
किसका रोना रो रहा है ओ रोने वाले
नाखुदा बने फिर रहे हैं सफीने डुबोने वाले
कमज़ोर का न कोई सनम न खुदा है
सर झुकाए जीना सर्वहारा होने की सजा है.